भारत में प्रेस फ्रीडम रिपोर्ट बोगस व् फ्राड पर आधारित,प्रेस कोंसिल चुप क्यों?

कौटिल्य वार्ता
By -
0

 भारतवर्ष के बारे में कहा जाता है कि अगर भारतीय न फूटे  तो विदेशी आक्रमण कभी भी नहीं हो सकता था ।इसका उदाहरण सिकंदर के समय आम्भी अंग्रेजों के समय मीर जाफर और मोहम्मद गौरी और मोहम्मद गजनबी के समय उत्तर भारत के तमाम अति महत्वाकांक्षी लोगों का हाथ रहा है ।इन लोगों ने पैसे के लिए अपना सर्वस्व समर्पण विदेशियों के हाथ कर दिया ।


आज स्थिति ठीक उसी तरह की भयावहता का रूप ले रही है स्थिति यह है कि पूरे देश में आज प्रेस स्वातन्त्र्य को लेकर के बहस चल रही है। बताते हैं कि भारतवर्ष में प्रेस को सबसे बड़ा खतरा  है बताते  तो यह भी हैं कि दुनिया में 161 नंबर पर भारत का प्रेस स्वातन्त्र्य  है ।कितनी खराब स्थिति है कि अगर दुनिया में भारत में प्रेस आजाद नहीं है तो मुझे लगता है कि दुनिया में कहीं भी स्वतंत्र नहीं है ।भारत को बदनाम करने की पाश्चात्य और बाम आकांक्षाओं की परिणति है जो एक योजनाबद्ध तरीके से भारत के तंत्र को, भारत की व्यवस्था को और भारत के प्रशसन के  मामले को उठाकर बदनाम करना चाहते हैं।

 जर्मन की एक संस्था जिसने पत्रकारिता के क्षेत्र में बताते हैं कि वैश्विक शोध किया है ।उसने बेसिक शोध में भारत में भारत में प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 161वे स्थान पर है। जर्मन की संस्था रिपोर्टर विदाउट वार्डन ने कहा है कि भारत में प्रजातंत्र खतरे में है। पश्चिम की पुरानी नीति रही है हमेशा भारत को बदनाम करो। आज तक इस देश में किसी ने भी जिनको बहुत प्रेस फ्रीडम की चिंता है ,उन्होंने 1975 में आपातकाल के मामले को नहीं देखा। जहां सेंसरशिप ने प्रेस का गला घोट दिया था ।तब भी हमारा इंटेक्स ऊंचा था ।एक प्रेस का व्यक्ति होने के नाते मुझे पूरा विश्वास है कि कहीं भी भारतवर्ष में किसी भी स्थान पर प्रेस को बेड़िया  नहीं लगी हुई हैं ।

इंदिरा गांधी के जमाने में बिना एसडीएम और प्रशासनिक अधिकारियों को दिखाएं हम विज्ञप्तिभी  नहीं छाप सकते थे ।आज बताते हैं कि 10 पत्रकार जेल में हैं उस समय न जाने कितने लोग जेलों में थे ।हमारे जैसे लोगों ने 19 महीने की सजा काटी परंतु भारत को इतनी बदनामी तब नहीं मिली थी ,जो आज बाम और काम के नाते मिल रही है।

 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक पांच अलग-अलग कारकों पर स्थापित होता है जिसका उपयोग संस्थाएं करती हैं राजनीतिक ,आर्थिक ,सामाजिक ,सुरक्षा आदि तमाम कारण हैं जिनके कारणों से रस का स्वतंत्रता जाता है। मैं पूरी गारंटी के साथ कह सकता हूं भारतवर्ष में कहीं भी इतनी प्रेस की खराब स्थिति नहीं है जितना जर्मन की संस्था ने कहा है? यह तो वही हुआ अमेरिका और चीन तथा तमाम एजेंसियों को इशारे पर विश्व का प्रेस बिका हुआ है और वर्तमान शासन तंत्र को सदा असहज करता रहता है ।

मैं गारंटी के साथ करता हूं भारत में स्थिति इतनी खराब नहीं है जितना कि बताया गया  है पूर्ण   सही है यह तो मैं नहीं कह सकता परंतु भारत के प्रति घृणास्पद भाव रखने वाले लोगों के मन में यह बात घर कर गई है और उनके आंख का पानी और कलम की स्याही तक सूख गई जब भारत को पाकिस्तान अफ़गानिस्तान और अब इंडोनेशिया तमाम देशों से भी नीचे लाकर खड़ा कर दिया गया ।सुविधा के  नाम पर कागज कलम और विदेशियों से धन लेकर  पूर्वाग्रह पूर्वक देश को बदनाम करने वाले  की मानसिकता दशकों तक राज करने वाले राजघराने आज सत्ता प्रतिष्ठान से दूर होने के नाते येन केन प्रकारेण प्रेस फ्रीडम की दुहाई दे रहे हैं ।40 बर्ष  से पत्रकारिता के जीवन में मुझे आपातकाल से बड़ा खतरा भी नहीं महसूस हुआ ।जहां अखबारों ने आपातकाल की जय और संपादकीय पृष्ठ खाली छोड़ दिए थे ।मेरा उन सारे लोगों से आग्रह है जो भारत को 161 में स्थान पर खड़ा कर रहे हैं वह पूर्वाग्रह से प्रेरित है।

 जर्मन का संस्थान जिसने भारत में प्रेस फ्रीडम पर प्रश्न उठाया है वह बोगस और बौद्धिक दिवालियापन का शिकार है कम से कम उसको इतना तो विचार कर लेना था जो रामराज्य की कल्पना कर रहा है वह प्रेस को कभी भी कुचल नहीं सकता। 

मैं यह मानता हूं कि कहीं से किन्ही  कारणों से किसी को ठेस लगी होगी ,लेकिन प्रेस को किसी के इशारे पर इतने नीचे गिर कर के161वे स्थान पर भारत को खड़ा करना स्वयं उस एजेंसी के ऊपर प्रश्न खड़ा करता है जिसने भारत को 161वे स्थान पर खड़ा  कर दिया ।

और भारत की  प्रेस परिषद लंबे चौड़े वेतन और पैसे लेने का सिर्फ कर ही कह रही है ?सरकार की और देश की विश्व में आलोचना हो रही है और बैठ कर के मौज मस्ती करने वाले लोग आखिर क्या कर रहे हैं ? इससे तो यही लगता है कि भारत की प्रेस काउंसिल न्यायमूर्ति भले बैठे हैं लेकिन उनकी नियति  निति और निष्ठा सब संदिग्ध है ।आखिर भारत पर चौतरफा हो रहे आक्रमण पर प्रेस की स्वतंत्रता के लिए प्रेस काउंसिल को हाथी दांत बंद करके खड़ा रहना नहीं चाहिए।

प्रेस फ्रीडम सर्वे करने वाली संस्था रिपोर्ट विदाउट बॉर्डर्स की आख्या बोगस् और आधार हीन है।

राजेन्द्र नाथ तिवारी


Post a Comment

0Comments

Please Select Embedded Mode To show the Comment System.*