एक पत्रकार महात्मा !

2अक्टूबर पर जब देश गांधी शास्त्री को कल अपनी स्मृणाजली सोपैगा, ऐसे में लोकनीति में प्रकाशित अनाम लेखक का लेख पत्रकार महात्मा शीर्षक से परोस रहा हू,संभव है कुछ प्रतिक्रियाएं पाठक हमे भी परोसे,संकलन के अतिरिक्त इस लम्बे लेख में मेरा कोई योग दान नही.



राष्ट्र भाषाः  हिंदी-हिंदुस्तानी के प्रचार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा 15 जून 1941 ई. में ‘राष्ट्रभाषा’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया।.

खादी  जगतः  15 जुलाई 1941 ई. को सेवाग्राम वर्धा के तत्वावधन में आशा देवी और श्रीकृष्णदास गांधी के संपादकत्व में ‘खादी-जगत्’ नामक मासिक पत्र का प्राकाशन प्रारंभ हुआ। उक्त पत्र में खादी से संबंधित लेख छपे रहते थे। वस्तुतः खादी के अर्थशास्त्रा पर आधरित तथा अखिल भारतीय चरखा संघ के परीक्षणों के आधार पर तैयार किए गए लेखादि का समावेश रहता था। इसमें खादी परीक्षा की सूचना एवं उसके परिणाम भी प्राकशित होते थे।

संसारः  सन् 1943 ई. में संसार प्रेस काशी से बाबूराव विष्णुराव पराड़कर द्वारा स्थापित ‘संसार’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसका संपादन कमलापति त्रिपाठी और काशीनाथ उपाध्याय ‘भ्रमर’ के हाथों में था। यह पत्र कांग्रेसी नीतियों का समर्थक था। सम-सामयिक समस्याओं पर लेख एवं टिप्पणियां प्रभावपूर्ण होती थीं।

नया हिंदः  ‘हिंदी-हिंदुस्तानी’ भाषा से संबंध्ति गांधी जी के विचारों को प्रचारित एवं प्रसारित करने के उद्देश्य से जुलाई 1946 ई. को पंडित सुंदरलाल ने प्रयाग से ‘नया हिंद’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया था। यह दो लिपियों में छपता था और अरबी, फारसी भाषा से प्रभावित था।

गांधी  मार्गः  गांधी स्मारक निधि बंबई के तत्वावधन में गांधीवाादी विचारधारा से ओतप्रोत ‘गांधी मार्ग’ नाम त्रौमासिक पत्रिका हिंदी और अंग्रेजी दो भाषाओं में निकलती थी। कालांतर में यह पत्रिका गांधी शांति प्रतिष्ठान नई दिल्ली से द्वैमासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित होने लगी। आज के संदर्भ में गांधी के विचारों की प्रासंगिकता का परिचय ‘गांधी-मार्ग’ के संपादकीय एवं उच्चस्तरीय लेखों में सहज ही मिल जाता है। वर्तमान में यह पत्र गांधी जी के आदर्शों, सिद्धांतों व उनके विचारों का प्रचार व विश्लेषण करने, जनता तक उनको पहुंचाने का कार्य कर रहा है।

अतः हम कह सकते हैं कि गांधी की पत्रकारिता की शुरुआत से लेकर अंतिम समय तक संघर्षों का लंबा इतिहास रहा है। कभी गांधी पत्रकारिता पर भारी दिखते हैं तो कभी पत्रकारिता गांधी पर। यह शह-मात का खेल गांधी के जीवन पर्यंत बना रहा।

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