अरेंज मैरिज और लव जिहाद का जो अंतर नहीं जानता ,वह कुछ भी होसकता है पर शंकराचार्य कैसे???? राजेन्द्र नाथ तिवारी

कौटिल्य वार्ता
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विश्वास किया जाता है कि शंकराचार्य जैसी संस्था का प्रतिनिधित्व करने वाला मेधावी व्यक्तित्व निसंदेह, स्थान, काल ,परिस्थितियों और समाजशास्त्रीय विषयों का अध्येता व् जानकार अवश्य होगा। उससे भारतीय संस्कृति और संस्कृत विषयों की परंपरा पर विवादित बयान देने की कम से कम उम्मीद नहीं की जा सकती है। परंतु जुगाड़ू संस्कृति अपनाकर संभव है कि शंकराचार्य का पद भी प्राप्त किया जा सकता है ,उसी जुगाधु संस्कृति का नाम है अविमुक्तेश्वरानंद ।आदरणीय श्री स्वरूपानंद जी के शिष्य हैं और इनको अपनी जानकारी अपनी मेधा और अपनी संस्कृति की ज्ञात मेधा पर बहुत घमंड है ।घमंड इस बात का है संभवत उनका मानना है कि उनके अतिरिक्त समाज में कोई भी जानकारी किसी के पास नहीं है ।परंतु सन्यास धर्म ग्रहण करते समय पहली शर्त होती है, अहंकार रहित बयान और अहंकार से परे सादा जीवन ,गंभीर विचार शंकराचार्य के जीवन की परिणति होती है।

परंतु गत दिनों मेरठ में लव जिहाद पर शंकराचार्य अभिमुक्तेश्वरा नन्द द्वारा दिया गया बयान, उनकी बौद्धिक आईक्यू को प्रमाणित करता है ।जिस शंकराचार्य को लव जिहाद और अरेंज मैरिज का अंतर नहीं मालूम कम से कम उसको शंकराचार्य के दायित्व का निर्वहन करने का अधिकार नहीं है ।आजकल भक्ति की परंपरा चल पड़ी है नवधा भक्ति में आत्म प्रशंसा भी एक भक्ति है अपनी आत्मा कों कांग्रेस के हाथो गिरवी रख चुके अभिमुक्तेश्वरानन्द जिस तरह से मेरठ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ विचारधारा के लोगों पर लव जिहाद की अनैतिक व्याख्या की है वह व्याख्या देश व् समाज को अमान्य है अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग मुसलमानों से शादी करते हैं और लव जिहाद की बात करते हैं ।अभिमक्तेश्वरानन्द का प्रदूषित मन अंधी गली में अनिश्चय वाला है ,फिर भी हमें उनके नीति और नियति दोनों पर शक है जिस तरह से उन्होंने रामलाल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों पर धावा बोला है उनके बेचारिकी विद्रूपता का कारण है ।

दो पक्षों में मिलकर के शादी होना लव जिहाद की परिधि में नहीं आता है, लव जिहाद उसे कहते हैं अल्पव्यस्क,व्यस्कों को येन केन येन प्रकारेण प्रलोभन और प्रताड़ना देकर अपनी बात को सिद्ध कराने का प्रयास होना। मैं मानता हूं सजाती विवाह सनातन परंपरा है ,पर दो दिलों के मेल पर अरेंज मैरिज ही सनातन परंपरा है, जिनको मुसलमानों के बारे में घमंड है कि हम उनको हिंद महासागर में उठाकर के फेंक देंगे उन लोगों ने सोमनाथ मंदिर की रक्षा क्यों नहीं किया ।27 वर्ष में मुसलमानों ने 17 आक्रमण किया और आज विद्रूपता भरे बयान देकर के जगतगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित शंकराचार्य के पद को अपवित्र करने का काम अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा किया जा रहा है। उनके द्वारा किया गया प्रयास यह कार्य किसी भी प्रकार से हिंदू संस्कृति ,सनातन संस्कृति ,आर्य संस्कृति के मेल नहीं खाता। संत हमेशा क्षमा कार्यकारी होता है किसी की भी बातों को क्षमा करना संत की पहली शर्त है और जिस तरह से मेरठ के सांसद के ऊपर अपने चारणों द्वारा हाथ पकड़ कर के अपने ऑफिस से बाहर करवा दिया गया निसंदेह शंकराचार्य के बौद्धिक, मानसिक ,शारीरिक व तार्किक क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है ।

मैं ऐसे अविमुक्तेश्वरानंद जिनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद रहे उनके बयानों की निंदा करता हूं । और मै मांग करता हूं जिस धर्माधिष्टित समाज को चलाने के लिए शंकराचार्य का दायित्व आदि शंकराचार्य ने निर्धारित किया था वह आज राजनीती के अखाड़े से शंकराचार्य को कोई लेना देना नहीं। लेकिन अभी मैं स्वरूपानंद की तरह विवादित बयानों के बयान बीर माने जाते हैं ।मेरा विश्वास है पता नहीं उनके पास पहुंचेगा कि नहीं परंतु मैं दावे के साथ कहने के लिए तैयार हूं जगतगुरु शंकराचार्य की पीठ पर स्वामी स्वरूपानंद के उत्तराधिकारी शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार हूं ।

बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी ,कांग्रेस का नहीं है बात परस्पर मानसिक ,सामाजिक स्वीकार्यता का है और शादी कोई कहीं भी कर सकता है इसके लिए मनुस्मृति भी आदेश देती है ,हिंदू ला में भी हिंदू मैरिज एक्ट की व्यवस्था है ।मुसलमान और हिंदू, हिंदू और ईसाई ,ईसाई और यहूदी आदि लोग अगर मन वचन कर्म से एकाग्र होकर के परस्पर एक दूसरे के प्रति समर्पित होकर के विवाह जैसी पवित्र परंपरा में बांधने का प्रयास करते हैं पवित्र बंधन माना जाना चाहिए ,जिसमें प्रताड़ना का कहीं कोई स्थान नहीं है ।

यह शंकराचार्य एक तो लगता है श्रीमद् भागवत का गोकर्ण का भाई धुंधकारी है। उल्टा सोचना ही उसका व्क्तियक्तित्व रहा है।उसने भारतीय संस्कृति और सभ्यता को भी नष्ट करने का प्रयास किया है विवादित बयानों के लिए चर्चा में बने रहना और विवादों के लिए कांग्रेस की चारण भक्ति में लीन रहना जो काम स्वरूपानंद का था वही काम अविमुक्तेश्वरानंद का भी है ।जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि को पकड़कर के बाहर भेजने और उनकी मन वचन कर्म से विवेचन करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं अगर समाजशास्त्रीय अध्ययन अविमुक्तेश्वरानंद का नहीं है तो उनको पहले किसी गुरुकुल में जाकर के शिक्षा लेनी चाहिए ।आज की परिस्थितियों में शंकराचार्य के दायित्वों का निर्वहन करने के लिए प्रशिक्षण देना चाहिए अयोध्या ,मथुरा ,माया ,काशी ,कांची ,अवंतिका कहीं भी अगर उनको आत्म शुधि या मानसिक परिहार करना चाहिए। अगर उनको संसार में कही स्थान नही मिलता तो में महाराज वशिष्ठ का वैचारिक समर्थक (जहाँ दशर्थात्विमेजों) ने शिक्षा ग्रहण की थी उस अभिक्तेश्वरानंद को नि:शुल्क शिक्षा देने के लिए तैयार हूं।

बस ईश्वर से अपेक्षा सनातन परम्परा में इतनी वैचारिकी की गिरावट वाला दूसरा अभिंक्तेश्वरा नन्द फिर धरती का भार न बने।अगर अभिमक्तेश्वरनन्द जी को बहुत बक बकाने का शौक है तो इश्लाम पर सही बात बोलकर हिम्मत दिखाए।पहला समर्थन उनको मेरा होगा।

नोट, मुझे पाठकों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

भारतीय संस्कृति, सभ्यता और सनातन धर्म की परंपरा पर तथाकथित शंकराचार्य  श्री अभीमुक्तेश्वरानंद की अज्ञानता पूर्ण टिप्पणी पर आपका लेख पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। ऐसे अज्ञानी संतो को आपने लेख के माध्यम से चुनौती दिया, बहुत ही सराहनीय है। आप इसी तरह देश, संस्कृति, सनातन धर्म के विषय में अपना विचार व्यक्त करते रहें।अशोक सिंह गोरखपुर

 सादर धन्यवाद

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