येन बद्धो बली राजा !रक्षाबंधन का पवित्र प्रतीक-रक्षासूत्र !

कौटिल्य वार्ता
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श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। इस दिन बहनें भाईयों की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधती हैं। यह पर्व नारी के प्रति पवित्र भावना की प्रेरणा तो देता ही है साथ ही उसे शक्ति के रूप में स्वीकार करने की शिक्षा भी देता है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक कथाओं में इसका प्रमाण मिलता है। इंद्र को देवासुगर संग्राम में विजय तभी मिली, जब देवी शचि ने पवित्र भाव से उन्हें रक्षासूत्र बाँधा। अर्जुन,शिवाजी, छत्रसाल आदि महापुरूषों की सफलता के पीछे भी रक्षासूत्र के रूप में उनका नारी के प्रति पवित्र दृष्टिकोण ही महत्व रखता है।


रक्षासूत्र बाँधने में भारतीय ऋषि परंपराओं का भी अपना विशेष महत्व है। इस दिन आचार्य-ब्राम्हण अपने यजमानों को रक्षासूत्र बाँधते हैं आचार्य-ब्राम्हण का यजमानों को रक्षासूत्र बाँधने का भाव यह है कि यजमान समृद्ध हों और वे अपने पवित्र कर्तव्यपालन और मर्यादाओं का ध्यान रखें। इसी पवित्र भाव से बहन भी भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं। इस दिन व्रत (उपवास) का विधान भी आता है।

जो परिवार व्रत रखते हैं, उन्हें चाहिए कि इस दिन प्रातः सविधि स्नान करके देवता, पितर और ऋषियों का तर्पण करें। दोपहर के बाद ऊनी, सूती या रेशमी पीत वस्त्र लेकरउसमें सरसों, सुवर्ण, केसर,चंदन, अक्षत और दूर्वा रखकर बाँध लें, फिर गोबर से लिपे स्थान पर कलश-स्थापन कर उस पर रक्षासूत्र रखकर उसका यथाविधि पूजन करें। उसके बाद विद्वान ब्राम्हण से रक्षासूत्र को दाहिने हाथ में बँधवा लें। रक्षासूत्र बाँधते समय ब्राम्हण को निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिए-

येन बद्धो बलीराजा, दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वां प्रति बध्नामि, रक्षे मा चल मा चल।।

इस व्रत के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है- प्राचीनकाल में एक बार बारह वर्षों तक देवासुर संग्राम होता रहा। जिसमें देवताओं का पराभाव हुआ और असुरों ने स्वर्ग पर आधिपत्यकर लिया। दुःखी, पराजित और चिंतित इन्द्र देवगुरु बृहस्पति के पास गए और कहने लगे कि इस समय न तो मैं यहाँ सुरक्षित हूँ और न ही यहाँ से कहीं निकल ही सकता हूँ। ऐसी दशा में मेरा युद्ध करना अनिवार्य है, जबकि अब तक के युद्ध में हमारा पराभाव ही हुआ है। इस वार्तालाप को इंद्राणी भी सुन रही थीं। उन्होनें कहा-‘‘कल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा है। मैं विधानपूर्वक रक्षासूत्र तैयार करूँगी, उसे आप स्वस्तिवाचन करके ब्राम्हणों से बँधवा लीजिएगा। इससे आप अवश्य विजयी होगें।’’ दूसरे दिन इन्द्र ने रक्षा विधान और स्वस्तिवाचनपूर्वक रक्षाबंधन कराया, जिसके प्रभाव से उनकी विजय हुई। तब से यह दिवस एक पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। 

रक्षाबंधन का पवित्र पर्व भद्रारहित अपरान्ह व्यापिनी तिथि में मनाया जाता है। यही शास्त्रों का मत है कि यदि पूर्णिमा दो दिन हो तो प्रथम दिन को महत्व दिया जाना चाहिए, यदि उस दिन भद्रा हो तो उसका त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि ज्योतिष एवं धर्मशास्त्रों का मत है कि इस मुहूर्त में रक्षासूत्र (राखी) बाँधने से राजा का अनिष्ट होता है-

भद्राय द्वे न कत्र्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।

श्रावणी नृपतिं हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी।।

यदि पर्व श्रावणी पर्व, श्रावणी उपाकर्म पर्व के रूप में भी मनाया जाता हैं श्रावणी विशेषकर देवपर्व है। वेदपारायण के शुभारंभ को उपाकर्म कहते हैं। इस दिन यज्ञोपवीत के पूजन का भी विधान है। ऋषि पूजन तथा पुराने यज्ञोपवीत को उतारकर नया यज्ञोपवीत धारण करना पर्व का विशेष कृत्य है। प्राचीन समय में यह कर्म गुरु अपने शिष्यों के साथ संपन्न किया करते थे। इस उपाकर्म में सर्वप्रथम तीर्थ की प्रार्थना के बाद वर्ष भर के जाने-अनजाने में हुए पापों के निराकरण के लिए प्रायश्चित रूप में हेमाद्रिस्नान संकल्प करके दशविध स्नान करने का विधान है।

रक्षाबंधन एवं सभी भारतीय त्यौहार और रिवाजों के पीछे कुछ गहरे वैज्ञानिक तथ्रू छिपे हुए हैं, जो मानव कल्याण से जुड़े हैं। रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाईयों की दाहिनी कलाई पर रक्षासूत्र बाँधती हैं। सांख्य दर्शन की दृष्टि से यह त्यौहार परिवार के सदस्यों के बीच प्यार, सामंजस्य, लगाव और प्रतिबद्धता पैदा करने के लिए एवं उनकी आंतरिक चेतना को नियोजित करने के लिए सर्वाधिक व्यावहारिक तरीका प्रदान करता है। रक्षाबंधन परिवार के सदस्यों के बीच प्यार, लगाव और जुड़ाव का त्यौहार है। यह वह दिन भी है, जब परिवार के पु$ष अपने परिवार के कल्याण के लिए संकल्प भी लेते हैं।

वास्तु शास्त्र की दृष्टि से देखें तो प्यार, स्नेह, देख-भाल और परिवार के बीच एक-दूसरे की सुरक्षा का भाव महावास्तु के 16 वास्तु क्षेत्र में से दो क्षेत्रों दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व से गहरे तौर पर जुड़ा है, क्योंकि रिश्तों और पारिवारिक जुड़ाव का वास्तु क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम है। यह परिवार के सदस्यों के बीच लगाव, प्यार, जुड़ाव और सामंजस्य को नियंत्रित करता है।

यह क्षेत्र हमारे परिवार के कल्याण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को भी नियंत्रित करता हैं किसी भी घर में दक्षिण-पश्चिम क्ष्ेत्र परिवार के बीच न केवल स्वस्थ रिश्तों को सुनिश्चित करता है, बल्कि पूर्वजों से आशीर्वाद दिलाने में भी मद्द करता है और यह परिवार के सुरक्षाबल के तौर पर काम करता है। जब घर का यह क्षेत्र संतुलित रहता है तो हमारे भाई और बहन हमेंशा हर तरह से हमारी मद्द के लिए तैयार रहते हैं। एक-दूसरे के हिातें की रक्षा और जिन्दगी की कठिनाईयों से समस्त परिवार की सुरक्षाकरने को यहां रखने वाले लोग प्रतीक रूप से तैयार रहते हैं

प्राचीनकाल से ही मानवीय निवास के बाहरी परिकर में मौजूद विभिन्न प्रकार के खतरों और भय से खुद को बचाने के लिए आग का प्रयोग किया जाता रहा है। मानव मन और सभ्यता के विकास के साथ ही हर तरह की बाधाओं, भय और समस्याओं से समान करने के लिए इसकी शक्ति को स्वीकार भी किया जाने लगा। महावास्तु में दक्षिण-पूर्व को अग्नि तत्त्च की दिशा माना जाता है, क्योंकि इसमें अग्नि के गुण मौजूद हैं, इसलिए यह हमारे जीवन में सुरक्षा लाता है।

आधुनिक समय में नगद धन की उपलब्धि इसी वास्तु क्षेत्र से संचालित होती है। आज के समय में आर्थिक संपदा ही सुरक्षा, शक्ति और आत्मविश्वास का प्रतीक बन गई है। रक्षाबंधन के पवित्र मौके पर भाई द्वारा अपनी बहन को धन प्रदान करने की परंपरा के पीछे यही मुख्य वजह है। जो भी हो, रक्षाबंधी भ्रातृत्व प्रेम का अनोखा पर्व है। इसके लिए अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं और हर मान्यता में एक गहरा प्रेम ही दिखाई देता है। रक्षाबंधी में बंधर का आधार रक्षासूत्र है, जिसकी पवित्रता सदा अक्षुण्ण रहने वाली है।

रक्षाबंधन आत्मीयता,राष्ट्रीयता,समरसता,विश्व बन्धुत्व व समाज जागरण का अनुपम पर्व है.

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