मन का तांडव, आध्यात्म का शिवाला

 



विवेकपूर्ण आनंद का सर्वोच्च शिखर विवेकानंद कहलाता है। कोलकाता के बालक नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद की स्थापना का सफर एक भारतीय संत का जरूर था। लेकिन आज जब हम उनकी गौरवशाली विरासत की चर्चा करते हैं तो स्वामी विवेकानंद को व्यक्ति या व्यक्तित्व से अधिक एक परंपरा के रूप में निरंतर प्रवाहित करने की आवश्यकता है। एक ऐसी आध्यात्मिक परंपरा जो हमें जीवन की परिस्थितियों से जूझने की यथार्थपरक दृष्टि प्रदान करती है। तनाव, लोभ, क्रोध, घृणा, अहंकार, क्षोभ, वैमनस्य, निराशा आदि नकारात्मक मनोभावों ने जो इतना तांडव मचा रखा है उन सब से यहाँ बचने की बात नहीं की जा रही क्योंकि ये सब भी जीवन के अनिवार्य चरण हैं जो सबके जीवन में कभी न कभी आते ही हैं।  इसलिए यहाँ बात की जा रही है दुष्कर छणों से निपटने की। ऐसे में स्वामी विवेकानंद का जीवन दर्शन हमारे लिए पथ प्रदर्शक की अक्षुण्ण ऊर्जा की तरह है।

कठोपनिषद का वह मंत्र जिसे स्वामी विवेकानंद ने ख्याति के एक नए आयाम तक पहुंचाया- "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" यानी- उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए। आज मोटिवेशनल स्पीकर्स द्वारा बताई जा रही सबसे पॉपुलर थ्यूरी, जिसे हम आकर्षण और कर्म के सिद्धांत (लॉ ऑफ अट्रैक्शन एंड लॉ ऑफ़ एक्शन) के रूप में जान कर अपना रहे वो स्वामी विवेकानंद द्वारा उधृत एक सूत्र वाक्य ही तो है। 

भावनाओं का सटीक प्रयोग करना पर अतिशय भावुकता से बचते हुए अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेदने का अनुप्रयोग भी हम विवेकानंद द्वारा शिकागो धर्म संसद में दिए गए आरम्भिक उद्बोधन ('अमेरिका के मेरे प्यारे भाइयों व बहनों!...)में देख सकते हैं। उस वाक्य के चमत्कारी प्रभाव से हम सभी परिचित हैं। वह चापलूसी नहीं थी और न ही आत्माभिमान। वह तो एक संतुलन था जो परोपकारी भावना का पुण्य होता है। 

स्वामी विवेकानंद जी पर लिखना अब हमारा कार्य नहीं। लिखा-पढ़ा बहुत जा चुका किंतु अंगीकार कम हुआ। अब हमें अंगीकार करना है। कहीं संसद लहूलुहान हो रही तो कहीं मासूम लोग। धार्मिक या राजनीतिक वर्चस्व के लिए हो रही हिंसा का बहिष्कार करना है। 

  • स्वामी विवेकानंद जी कहा करते थे पवित्रता, शुद्धता और उदारता किसी धर्म विशेष की मिल्कियत नहीं। 

  • सभी धर्म ईश्वर की ओर ही ले जाते हैं। इसलिए आपसी कलह नहीं शांति सद्भाव को बढ़ाना चाहिए। किसी की निंदा न करें। 

  • अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो जरूर बढ़ाएं। अगर नहीं बढ़ा सकते हैं, तो अपने हाथ जोड़िये, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये और उन्हें उनके मार्ग पर जाने दीजिए। 

  • कभी मत सोचिये कि आत्मा के लिए कुछ असंभव है। ऐसा सोचना सबसे बड़ा विधर्म है। अगर कोई पाप है, तो वो यही है; ये कहना कि 'तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं।

  • हम वो हैं, जो हमें हमारी सोच ने बनाया है इसलिए इस बात का ध्यान रखिए कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं, विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं।

  • जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।

  •  सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।

  • विश्व एक व्यायामशाला है, जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।

  • जिस दिन आपके सामने कोई समस्या न आए, आप यकीन कर सकते हैं कि आप गलत रास्ते पर सफर कर रहे हैं।

  • यह जीवन अल्पकालीन है, संसार की विलासिता क्षणिक है, लेकिन जो दूसरों के लिए जीते हैं, वे वास्तव में जीते हैं।

यदि आज हम स्वामी विवेकानंद जी के विचारों अगली पीढ़ी तक पहुंचना और साथ ही अपने जीवन में उतारने का संकल्प ले सकते हैं तब तो राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का उद्देश्य सफ़ल है अन्यथा साल भर बहुत से 'डे' आते हैं जाते हैं लेकिन हमें यह समझना होगा कि 'यूथ डे' की बात अलग है। उम्मीद है कि मेरे सभी पाठक अपने अपने स्तर से स्वामी विवेकानंद के विचारों को प्रचार, प्रसार से आगे बढ़कर 'अंगीकार' तक ले जाएंगे और इस युवा दिवस से अपने और अपनों के जीवन को एक आयुष्मान ऊंचाई तक ले जाएंगे। शेष फिर… 

सादर

डॉ. ऋतंभरा । 

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