*ओलंपिक मेडल का हौसला है स्पोर्ट्स व्हीलचेयर* हौसलों की उड़ान को मुश्किलों से नहीं रोका जा सकता

 


 कुछ ऐसी दास्तान है  नेशनल  सिल्वर मेडलिस्ट  पैरा शटलर सुमन की जन्म से ही शारीरिक रूप से दिव्यांग सुमन ने अपने हौसलों के दम पर वह मुकाम हासिल किया जोकि सामान्य  लोगों के लिए भी मुश्किल भरा है । 
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में दिव्यांग बच्ची का जन्म कहीं ना कही सामाजिक रूप से भी कमजोर कर देता है 
  सुमन का परिवार बुद्धेश्वर  चौराहा इलाके में फल  व सब्जी का ठेला लगाकर अपने परिवार का गुजर बसर करता है  
ऐसे में दिव्यांग बच्ची के पालन पोषण और पढ़ाई लिखाई की चिंता ने मां-बाप के चेहरे पर भी शिकन डाल दि ,लेकिन सामाजिक सहयोग व जागरूकता के चलते बचपन में सुमन का नामांकन एक विशेष विद्यालय में  हो गया जिसने के सुमन के साथ साथ परिवार को भी थोड़ी राहत पहुंचाई सुमन ने अपनी लगन से इस विद्यालय में पढ़ाई के साथ साथ खेल कूद और पेंटिंग में भी अव्वल स्थान बनाना शुरु कर दिया लेकिन नियत को शायद  बहुत दिनों तक मंजूर नहीं था आर्थिक समस्याओं के चलते विशेष विद्यालय  ने बस सेवाएं बंद कर दी और इसी के साथ सुमन की पढ़ाई लिखाई और खेलकूद  भी बंद हो गया 
 लेकिन जज्बे  को जिंदा रखते हुए उन्होंने घर पर ही पढ़ना शुरू किया और इस लगन को देखते हुए सामान्य विद्यालय के अध्यापक दिनेश जी ने सुमन का दाखिला काफी मुश्किलों के  के बाद  अपने  सामान्य विद्यालय में करा दिया  और पूरी मेहनत से पढ़ाई भी करवाई जहां भी जो समस्या आती उसका समाधान भी कराते थे और इस प्रकार से दसवीं  एवम बारहवीं  की परीक्षा पास की। 
 जहां पर प्रारंभिक दौर में तो स्कूल के साथ-साथ बच्चों के तालमेल और आने जाने मैं काफी समस्या से  सामना रहा। 
लेकिन दिनेश शर्मा जी के सहयोग और परिवार के हौसला अफजाई  की मदद से  सुमन ने हार नहीं मानी और  यूपी बोर्ड की परीक्षाएं बेहतर नंबरों से पास कर ली । 
 पढ़ाई में मेहनत करने के साथ-साथ खेलों के प्रति रुचि भी निरंतर बनी रही लेकिन अवसर और संसाधन ना मिलने के कारण इसे पूरी तरीके से अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका ।  ग्रेजुएशन के लिए सुमन का दाखिला डॉ शकुंतला मिश्रा पुनर्वास विश्वविद्यालय  लखनऊ में हो गया लेकिन फीस की कमी ,आर्थिक समस्या और दूरी के चलते  पुनः पढ़ाई  छूटने का भय सताने  लगा परंतु काफी आर्थिक संघर्षों के बाद उन्होंने विश्वविद्यालय में दाखिला तो लिया और अपने खेल प्रतिभा को भी निखारना शुरू किया।
 2016 में नेशनल *एथलीट* हरियाणा में खेलने के लिए उन्होंने संसाधनों की कमी के चलते लाठी-डंडे और  ईट पत्थर के माध्यम से अपनी प्रैक्टिस जारी रखी हरियाणा से लौटने  और 2017 में रायपुर ट्राई साइकिल हाफ मैराथन  में प्रथम आने के बाद ~के बाद~ सुमन का रुझान बैडमिंटन की ओर हुआ और उन्होने  कैलीपर्स और दोस्तों की टूटी  व्हीलचेयर  के माध्यम से बैडमिंटन की प्रैक्टिस शुरू करते हुए 2018  मे बनारस में पहले प्रतियोगिता में भाग लिया  जहां पर सुमन की कैटेगरी स्टैंडिंग से व्हीलचेयर wh2 कर दिया गया यह भी एक तरह  का चैलेंज था फिर 2019  मैं  थर्ड  पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप   प्रतिभाग करते हुए सिल्वर मेडल अपने नाम कर लिया 
सुमन रावत ने  कई अवार्ड से सम्मानित भी किया गया
यह सफर इतना आसान नहीं है   ।राष्ट्रीय स्तर  सिल्वर  मेडल जीतने के बाद भी सुमन को खेल के संसाधनों कोच और आर्थिक रूप से मदद की आवश्यकता है जिससे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैरा बैडमिंटन खेल सके इस कड़ी में डॉक्टर वीके गुप्ता के सहयोग से   सुमन को मोटिवेशन multi स्पोर्ट्स व्हीलचेयर प्रदान किया जोकि उनके खेल को गुणात्मकता प्रदान करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है ।
मोटिवेशन India संस्था दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए विशेष रुप से व्हीलचेयर बनाती है जिससे कि बास्केटबॉल बैडमिंटन ~~एथलीट~tennis सहित कई खेलों में दिव्यांग खिलाड़ियों को सरलता  हो  जाती है और उनकी  खेल प्रतिभा कई गुना बढ़ सकती है मोटिवेशन लगभग 600 sports व्हील चेयर को भारत के विभिन्न हिस्सों में वितरित किया है जिसका लाभ दिव्यांग खिलाड़ी निरंतर उठा रहे हैं
परंतु अभी भी उन्हें आवश्यकता है अच्छे बैडमिंटन कोच ,अच्छी स्पोर्ट्स व्हीलचेयर ,स्पोर्ट्स किट और आर्थिक संसाधनों की उम्मीद है कि मोटिवेशन  संस्था जैसी संस्था सुमन उनके जैसे हजारों दिव्यांग व्हील चेयर खिलाड़ियों के हौसले और पदक के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगी।
अमरेश चंद्रा की प्रस्तुति
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