लोकतंत्र ,राज्य , !राजनीति

 

अंधी गली की यात्रा का नाम ही राजनीति है,इसे समाज कैसे दरख रहा है ।।मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं कवि दुष्यंत की यह पंक्तियाँ आज हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक हैं जो अपने सदियों पुराने आत्म गौरव का लबादा ओढ़े घूम रहा है।  अपनी खूबी पर फ़क़्र  करना गुनाह नहीं पर खामियों की  पैमाना भी देखते चलना चाहिए। 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक  2013 से आज तक प्रतिवर्ष 12,000  किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं। एक कृषि प्रधान देश के लिए इस रिपोर्ट के बाद भी संज्ञाशून्यता स्तब्ध कर देती है। 200 देशों के ह्यूमन डेवलेपमेंट इंडेक्स में भारत  अभी 131 वें स्थान पर ही पहुँच सका है। भारत की गिनती एक निर्धन और पिछड़े लोगों का मुल्क में होती है। सरकारी शिक्षा के चीथड़े अति निम्न वर्गीय बच्चों से लेकर सुशिक्षित बेरोजगारों के साथ क्रूर मज़ाक बन कर समाज में उड़ रहे हैं।  नारी को दुर्गा मानने वाला देश कभी कभी तो आठ महीने की बच्ची को भी दुष्कर्मी से बचा नहीं पाता।  साथ ही किसी वयस्क लड़की  साथ यदि इस तरह का कुछ घटित हो जाय तो समाज के तथाकथित संभ्रांत उटपटांग बयानबाजियों की होड़ मचा देते हैं। राम की सत्यनिष्ठा, कृष्ण की न्यायप्रियता, बुद्ध का सत्य -अहिंसा-अपरिग्रह का संस्कार इनमें से एक भी ठोस लक्षण किसी भी समुदाय में नहीं दिखता। राज्य सबको चाहिए पर 'राजा' होने के उच्च आदर्श किसी को नहीं निभाने हैं। आजादी तो हमने पा ली पर आजाद होने के दायित्व अभी तक निभाना नहीं आया। इन सबके कारणों की छानबीन में यह समझ आता है कि हमारे पास बुनियादी समझ  से लेकर एक शक्तिशाली और प्रभावशाली राजनैतिक नेतृत्व क्षमता का भी अभाव रहा है।  हमने ब्रिटेन से प्रजातंत्र का पाठ्यक्रम तो ले लिया पर इसका अध्ययन कायदे से नहीं किया। इंग्लैण्ड का प्रजातंत्र बहुमत के सिद्धांत को मानता है और भारत में बहुमत है किसका ? बौद्धिक रूप से पिछड़ों का, अशिक्षितों का या कोरी डिग्रीधारकों का जो जातिवाद, क्षेत्रवाद, अंधविश्वास और धार्मिक उन्माद से जकड़ा पड़ा है। दागी व्यक्ति पैसे, बाहुबल और जातीय समीकरणों से सदन में पहुंचा दिए जाते हैं.  अब जो खुद नैतिक रूप से पतित है वह समाज काये उत्थान क्या खाक करेगा? भ्रष्टाचार को ब्रिटेन के सन्दर्भों में देखने पर पता चलता  है कि एक समय जब ब्रिटेन में भ्रष्टाचार चरम पर था तो राजनीतिज्ञ ओलिवियर क्रामवेल ने भ्र्ष्ट सांसदों और राजतंत्रवादियों  को रोकने में अपनी इक्छाशक्ति  से  काफी हद तक सफलता पाई। अप्रैल 1653 में सांसदों को खरी-खोटी सुनाते हुए कहा कि - "मैं आपको इस संसद में क्यों बैठने दूं? आप इस योग्य नहीं कि इस स्थान की गरिमा को समझ  सकें। सद्गुणों को त्यागने और अवगुणों को अपनाने के कारण आपने इस प्रणाली को बदनाम कर डाला है। एक न्यायप्रिय व्यवस्था के आप घोर शत्रु हैं। आप जनता के द्वारा उनके कष्टों के निवारण के भेजे गए थे किन्तु आपको अपने स्वार्थों की पड़ी है।  ईश्वर के लिए आप यहाँ से बाहर चले जाइये।"  क्रामवेल के इस भाषण ने ब्रिटिश सांसदों के अवमूल्यन को तो थाम लिया पर भारतीय सन्दर्भों में सोच कर देखिये। अवतारों के इस देश में राम-कृष्ण-गौतम द्वारा प्रदर्शित पथ निर्जन पड़े हुए हैं। क्या संसद क्या विधानसभा! सभी हंगामे, मारपीट और नारेबाजी से कराह रहे हैं। दरअसल जो अपने शैक्षिक धरातल पर ही सुसंपन्न नहीं हुआ हो वह संवैधानिक सुधार-उपचार  के महत्त्व या क्रियान्वयन को क्या समझेगा? शिक्षा के नाम पर मैकलेमय होती पीढ़ियों से आप भारतीय संस्कारों की अपेक्षा  नहीं सकते। शायद यही वजह है कि 1947 में मिली आजादी को सत्ता हस्तांतरण अधिक माना जाता है क्योंकि बदलाव तो कुछ ख़ास हुए नहीं।  गवर्मेंट आफ इण्डिया एक्ट 1935 की तरह  संविधान, कमोबेश वैसी ही न्याय व्यवस्था, आंदोलन तब भी होते थे आज भी होते हैं। शोषण, अत्याचार और भ्रष्टाचार का कुचक्र पहले भी भारत से धन की निकासी करता था, आज भी करता है।  हाँ शोषणकर्ताओं के चेहरे ज़रूर बदल गए हैं। स्वदेशी वस्तुओं का उपभोग भले ही यथोचित पैमाने पर पीछे हो पर अपने ये स्वदेशी तथाकथित जननेता, जिनके  बौद्धिक दिवालियेपन से छुब्ध समाज आज फिर से पुनर्जागरण की राह देख रहा है।

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