जिनको गीता में जिहाद नजर आता है, पाटिल जी धुंधले काँच के चश्मे को साफ कर लीजिये.राजेन्द्र नाथ तिवारी

कौटिल्य वार्ता
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सांस्कृतिक व राष्ट्रीय पुनर्जागरण को देश का युवा कांच के धुंधले चश्मे से न देखे।संस्कृत व संस्कृति के  आदि पितृ पुरुष आचार्य शंकर,और अर्वाचीन भारत को वैश्विक सम्मान के शिला लेखों प्रवर्तक स्वामी विवेकानन्द को आज का युवा आदर्श आदर्श तो मानता है पर  उनकी वैचारिकी आत्मसात करने से परहेज करता है।

भारत की सनातन परंपरा को पुनर्जीवन देने वाले आचार्य शंकर को केवल धार्मिक दृष्टि से देखना एक संकुचित दृष्टिकोण होगा। हमें पूरी आंख खोलकर तीन सौ साठ डिग्री पर इस विभूति को देखने की जरूरत है, जिसके बिना आज के भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत अगर अपनी मूल सांस्कृतिक आत्मा के साथ बचा रह पाया है तो उसके पीछे वही एकमात्र सूत्रधार हैं, जो समय के एक महाविकट मोड़ पर हुए। उनके ठीक बाद ही इतिहास का भयावह मध्यकाल है, जिससे भारत को गुजरना था।


आचार्य शंकर अपने समय के प्रखर दार्शनिक, दूरदृष्टिवान आदर्श गुरू और दृढ़ इच्छाशक्ति संपन्न नेतृत्वकर्ता और इससे भी कहीं अधिक थे। केवल उनकी देह पर पड़े भगवा वस्त्रों से उन्हें कोई सामान्य धर्मगुरू, संत या पुरोहित समझना अपनी ही आंखों में धूल झाेंकना है और हम इस अपराध में माहिर लोग हैं।




आचार्य शंकर और हमारे बीच कई सदियों का अंतर  है। स्वामी विवेकानंद और हमारे बीच सवा सौ साल की ही दूरी है। विवेकानंद अपनी स्मृतियों में  बहुत स्पष्ट हैं और हम उन्हें एक आम साधु या संत या धर्मगुरू की दृष्टि से कभी नहीं देखते। वे हमारे लिए आधुनिक भारत की सबसे प्रखर आवाज हैं, जिसने पश्चिम की दुनिया को पहली बार भारत के गहरे अर्थ समझाए। वे भी इतिहास के एक ऐसे विकट मोड़ पर आए, जब भारत भयावह मध्यकाल से बाहर निकल रहा था। समय के ये दो छोर हैं। एक पर आचार्य शंकर हैं, दूसरे पर स्वामी विवेकानंद।

 

ऐसा समझिए कि स्वामी विवेकानंद, भारत की जिस ज्ञान परंपरा के आधुनिक अग्रदूत बनकर सामने आए, आचार्य शंकर उसके आदि पुरुष हैं। उस विचार कुल परंपरा के पूज्य कुलपति हैं। 


दूषित सेक्युलर सोच से उपजी भगवा परिधान के प्रति हमारी संकुचित दृष्टि उस सत्य तक पहुंचाने में बाधक रही है, जिसका विराट जगत धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं है। वह उपनिषदों और गीता के महान दर्शन तक आकाश की तरह विस्तृत है। एक ऐसा असीम स्पेस, जहां हर प्रकार के बौद्धिक गरुड़ों को अपने प्रश्नों और तर्कों के शक्तिशाली पंखों से ऊंची उड़ानें भरने की पूरी स्वतंत्रता जन्मजात प्राप्त है। जहां कुछ भी थोपा नहीं, सब कुछ रोपा जाता है।


संस्कृत का समस्त रचना संसार पंडों का पूजा विधान नहीं है, जैसे अंग्रेजी में लिखा गया सब कुछ जीसस क्राइस्ट की स्तुति नहीं है। स्वास्थ्य के विषय में संस्कृत ने आयुर्वेद रचा। राज्य की नीतियों का पथ प्रदर्शन अर्थशास्त्र में आया। स्थापत्य के विषय में समरांगण सूत्रधार लिखे गए। विश्व के निर्माण की प्रेरक दर्शनों में ऋषियों ने वसुधैव कुटुंबकम् लिखा। सबके स्वास्थ्य और सबकी समृद्धि की कामनाएं कीं। वे समस्त संकीर्णताओं के पार गए। उपनिषद तर्क और प्रश्न से ही सत्य काे सिद्ध करने की एक प्रक्रिया हैं। बाल्मीकि और व्यास, पाणिनी और पतंजलि, आर्यभट्ट और वराह मिहिर, पंडित विष्णु शर्मा और आचार्य चाणक्य की रचनाएं हवन, यज्ञ, आरती, पूजा, प्रसाद के श्लोक या सत्यनारायण की कथाएं नहीं हैं। 


तत्वबोध और आत्मबोध नाम के दो छोटे-छोटे से ग्रंथ आचार्य शंकर ने बीज रूप में ही हमें सौंपे हैं। ये उन ऊर्जावान युवाओं के लिए एक विशेष उपहार हैं, जो अपना नया जीवन शुरू कर रहे हैं। उनके पास समय है और सपने हैं। जीवन के इस नाजुक मोड़ पर आचार्य शंकर के ये सूत्र उनमें सामर्थ्य जगाने का जरूरी काम पूरा करते हैं। वे हमारी नेत्रज्योति को बढ़ाते हैं ताकि हम जीवन को देखने और जीने की सटीक दृष्टि पा सकें।


मगर घिसे हुए काँच के चश्मों से देखकर हमने भारत की इस थाती को पाेंगा पंथी शास्त्र कहकर डस्टबिन में डाल दिया। दासता का समय बीत जाने के बाद स्वतंत्र भारत में यह कुल्हाड़ी हमने ही अपने पैरों पर चलाई। थोपे गए एकतरफा सेक्युलरिज्म के घातक दुष्परिणाम हुए हैं और इसके लिए न तो कोई बेचारा जाहिल मुगल जिम्मेदार है और न कोई शातिर वायसराय। 1947 में ये सब इतिहास की किताब के पलट चुके अध्याय थे। 


भारत को भारत की दृष्टि से देखने और दिखाने की जिम्मेदारी हमारे अपने लीडरों की थी, जिनके हाथों में घिसे हुए कांच के चश्मे थे और वे जानते थे कि वे देश की आंखों पर क्या चढ़ा रहे हैं! गीता में जिहाद ऐसे ही दिखाई नहीं देता, बहुत यत्न लगते हैं!!! 


स्वतंत्र भारत की शिक्षा व्यवस्था ने परंपरा की इस मजबूत कड़ी को न भुलाया होता तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि आजादी के अमृतकाल तक आते-आते देश की तीन पीढ़ियाँ अपने शिक्षा परिसरों से किस सांचे में ढलकर निकली होतीं! मगर वे अपनी दार्शनिक विरासत से पूरी तरह डिस्कनेक्ट रहीं। एक राष्ट्र के रूप में भारत के प्रति हमारे बोध बहुत धुंधले हैं। हम घिसे हुए कांच के चश्मे पहनकर दृष्टि संपन्न होने का दावा करने वाले पाखंडी हैं, जिन्हें अब समझ मंे आ रहा है कि चश्मा गलत चढ़ा है। दोष दृष्टि में नहीं है।


तत्वबोध 55 पेज की एक ऐसी पुस्तक है, जिसमें 60 श्लोक हैं। आचार्य शंकर की यह कृति उपनिषद और गीता को समझने में एक सहायक ग्रंथ है। यह वेदांत दर्शन की पहली पुस्तक के रूप मंे प्रसिद्ध है। हमारी ज्ञान परम्परा ने इसकी  इसका अनेक भाषाओं में अनुवाद  किया हुआ है।गोरखपुर के #गीताप्रेस का योगदान अतुलनीय है।


आत्मबोध 63 श्लोकों की रचना है, जिसमें आचार्य शंकर की काव्य प्रतिभा की एक झलक मिलती है। वे इनमें दृष्टांतों के जरिए जीवन के शब्द चित्र प्रस्तुत किए हैं। हरेक श्लोक में एक खास ध्वनि और लय है। बच्चों को वेदांत से परिचय कराने के लिए आचार्य शंकर ने उपनिषदों का अमृत इस रचना में लिया है। 


ये दोनों ग्रंथ जिज्ञासु युवाओं के लिए भारत की महान वैचारिक और दार्शनिक दहलीज पर दस्तक देने का एक आमंत्रण हैं।


कोई जरूरी नहीं कि आप 12 वर्ष किसी गुरुकुल में परंपरागत ज्ञान ही प्राप्त करें। आप अपने कॅरिअर के लिए इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक, प्रोफेसर,  पत्रकार व्यवसायी, कृषक जैसे विषयों में डिग्रियां लेते हुए भी अद्वैत दर्शन परंपरा की एक झलक अपने भीतर उतार सकते हैं। इतिहास में एक हजार साल के दो छोर पर सिर्फ 32 साल की उम्र के आचार्य शंकर और 39 उम्र के स्वामी विवेकानंद उसी महान विरासत की तरफ एक संकेत करने ही हमारे बीच आए। 


यह शुभ संकेत है कि आज की जागृत पीढ़ी उन संकेतों को स्वयं समझ रही है। वह घिसे हुए कांच के चश्मे उतार रही है। उसकी दृष्टि अब पिछली पीढ़ियों से बेहतर साफ है। आत्मबोध और तत्वबोध के द्वार पर उसकी यह नन्हीं सी दस्तक स्वागतयोग्य है। इनके भीतर आने वाले समय में युवाओं की चहलपहल बढ़ने वाली है। इसे रोकने का अब कोई उपाय नहीं है।

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