दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली,मजाक बनती परीक्षाएं,विकास और चरित्र निर्माण् समानांतर न होने का नतीजा!! राजेन्द्रनाथ तिवारी


शिक्षा क्या सर साध सकेगी यदि नेतिक आधार नही है. भारत में यदि नैतिकता नही तो कुछ भी नही.पूरी परीक्षा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रही पेट ( pet)परीक्षा.जिस आपाधापी में यह परीक्षा सम्पन्न होरही वः अपने आप के शुचिता का कलंकित अध्याय जैसा हे।परीक्षाये शुचिता के लिए होती हे प्रश्नो की बौछार के लिए नही. उत्तर प्रदेश सरकार की नोकर शाही लगता है लोकशाही पर हावी है, अन्यथा सहारनपुर का परीक्षार्थी प्रयागराज और बस्ती का देवरिया व् बहराइच नही जाता.हजारो लोग वंचित रहगये ,सरकार क्या उत्तर गी. मोदी और योगी की सरकार की शुचिता प्रदेश की नोकर शाही कलंकित कर रही हे.भूसा कीतरह बसो व् ट्रेनों में ठूस ठूस कर भरेगये परीक्षार्थी जीवन भर का दर्द हृदय में दफनायें रहेगे.


तकनीकी विकास के बावजूद देश में परीक्षाएं मजाक बन गई हैं। कुछ वक्त पहले पंजाब में पुलिस भर्ती परीक्षा का पेपर लीक हुआ तो अब राजस्थान में रीट का पेपर लीक होने से परीक्षार्थी मायूस व परेशान हैं। सभी को यह उम्मीद थी कि इंटरव्यू की शर्त खत्म होने से भ्रष्टाचार से राहत मिलेगी, लेकिन परीक्षा का पेपर लीक होने से अयोग्य परीक्षार्थी नौकरियों पर कब्जा करने के सफल होंगे। ईमानदार और पेपर खरीदने की समर्था नहीं रखने वाले परीक्षार्थी केवल सरकार को कोस ही सकते हैं।

 विगत वर्षों में यही हाल सीबीएसई और विभिन्न राज्यों की दसवीं व बारहवीं की वार्षिक,प्रतियोगी परीक्षाओं में देखा गया, जब कई विषयों के पेपर लीक होने के कारण परीक्षाएं रद्द होती रही। बार-बार परीक्षा होने के कारण विद्यार्थी मानसिक तनाव से गुजरते रहे। स्वतंत्रता के 74 वर्ष बाद भी नकल रहित या पेपर लीक होने की समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सका, उल्टा गैर-कानूनी तरीके से परीक्षाएं करवाने वाले खूब चांदी कूट रहे हैं।

 वस्तुतः देश का विकास और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण सामांतर नहीं हो रहा। भौतिक विकास तो हो रहा है लेकिन मानसिक रूप से व्यक्ति बेईमानी, रिश्वतखोरी जैसी कुरीतियों का शिकार होकर दूसरों के अधिकार छीनने पर उतारू है। यह तथ्य है कि बेरोजगारी की समस्या भी भयानक है और नौकरियों की कमी के कारण लोग नैतिकता भी दांव पर लगा रहे हैं। दरअसल वर्तमान समस्याओं को किसी एक पहलू से देखने की बजाय इसका बहुपक्षीय समाधान निकालना होगा।

शुचिता और संतोष की भावना को बढ़ावा देना होगा, लेकिन यह तब संभव है यदि इसकी शुरूआत उच्च पदों पर बैठे राजनीतिक नेता करें। भ्रष्टाचार के खिलाफ जब भी शिकंजा कसा जाता है तब उसकी जड़ें राजनीति से जुड़ी हुई मिलती हैं। उच्च अधिकारी पैसे लेकर मामले को खुर्द-बुर्द कर देते हैं। 

ईमानदार नेता और अधिकारियों की कमी के कारण ही देश खोखला होता जा रहा है। यदि दोषी व्यक्तियों/ अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, फिर ही भय पैदा होगा, लेकिन गैर-कानूनी कार्यों को अंजाम देने वालों को कहीं न कहीं यह भरोसा होता है कि वे कानूनी दांव-पेच से बच निकलेंगे। हमारे देश के लिए ‘बेईमानों का देश’ जैसे शब्द इस्तेमाल होना बेहद दु:खद है।

उत्तर प्रदेश में नियुक्तियो को लेकर जिस प्रकार प्रतिभाओ में कुंठा पल्लवित होरही हे वह अत्यंत दुखद है. साल भर ही परीक्षा के परिणामो की वाध्यता प्रतियोगी छात्रो को और अधिक कुंठित कर रही है. विश्वास है लोकशाही और नोकर शाही समवेत युवा कुंठा का सार्थक हल निकालेंगी.मुझे तो लगता है मोदी योगी का बदनाम करने कराने का इरादा है प्रदेश की लोकशाही का.

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