उत्तर प्रदेश में सहाकारिता आंदोलन, वास्तविकता और दिखावट में कितना अंतर ?


उत्तर प्रदेश में सहकारिता का 67वां सहकारिता सप्ताह मनाया जा रहा है ।सहकारिता मंत्री और अधिकारी अपनी पीठ ठोक रहे है ।

इधर समूचे पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश के 25 जनपदों की पैक्स(प्रारंभिक कृषि ऋण सहकारी समितियां),जिसमे मा0 प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री और सहकारिता मंत्री के जनपद भी शामिल है, अपने किसी भी सदस्य को ऋण सुविधा नही प्रदान कर रही है ।अपने सदस्यों की आर्थिक उन्नति में उनका कोई योगदान नही रह गया है ।इन जनपदों की लगभग 3500 पैक्स मात्र परचून की दूकान बनकर कैश उर्वरक पब्लिक में कर रही है ।सहकारी सदस्य का कोई मतलब इन जनपदों की पैक्स के लिए नही रह गया है ।

उक्त 25 जनपदों में 16 केंद्रीय सहकारी समिति के रूप में 16 जिला सहकारी बैंक कार्यरत है ।सभी बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक से बैंकिंग व्यवसाय हेतु बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट तहत लाइसेंस प्राप्त है ।इन सभी बैंको का गठन लगभग 100 वर्ष पूर्व समाज के उस समय के प्रबुद्ध वर्ग अधिवक्ताओं द्वारा ज़िला कचहरियों में किया गया था ।सन 1940 से 1945 के मद्धय सभी बैंको को पब्लिक डिपाजिट लेने का अधिकार मिला था ।आज स्थिति यह है कि अधिवक्ता,किसान, साधारण अन्य जमाकर्ता अपनी डिपाजिट लेने के लिए बार बार इन ज़िला  सहकारी बैंको का रोज़ चक्कर लगा रहे है ,शाखाओं द्वारा नौकरशाहों द्वारा बनाये गए भुगतान नियमो का हवाला देकर उन्हें लौटाया जाता है ।कहने को इन बैंको को केंद्र सरकार,प्रदेश सरकार और नाबार्ड ने इन बैंको को 19 अरब 24 करोड़ रुपये सहायता के रूप में दिया गया है ।लेकिन इन बैंको का आका है शीर्ष बैंक (उ0प्रदेश सहकारी बैंक)।अधिकांश पैसा अपने यह निवेश करा लिया है ।केवल प्रति तिमाही व्याज देता है और निर्देश है कि इसी से कार्य चलाइये ।नया डिपाजिट जमा कराने का लक्ष्य इन बैंक के कर्मचारियों को दिया जाता है ।कर्मचारी कहाँ से लाये नए जमाकर्ता ।उसी क्षेत्र के पुराने जमा करता शादी विवाह के लिये,बीमारी के लिए अपनी जमा पूंजी लेने के लिए प्रमाणपत्र लेकर बैंक सचिव,CDO, DM के यहाँ चक्कर लगा रहे है ,वही से नये DEPOSITORS कहाँ से उगाया जाय ।अपनी साख नित्य प्रतिदिन गिरा भी रहे है और कह रहे है साख भी पैदा करने का आदेश दे रहे है ।कहने को क्या सहकारी सिद्धांतो मुख्य आधार सहकारी समितियो की स्वायत्तता है ,लेकिन आधुनिक बनाने के नाम पर लूट के लिये सुविधाएं प्रदत्त करने के लिये सभी निर्णय केन्द्रीयित कर लिए गए है ।जो सुविधा स्थानीय स्तर पर 50 रुपये में मिल सकती है उस सुविधा के लिए 100 रुपये भुगतान कराया जा रहा है ।कहने सभी बैंक इंटरनेट बैंकिंग सुविधा युक्त है लेकिन बैंको और पैक्स को आपसी संव्यवहार नही करने दिया जा रहा है ।

यही है सहकारी आंदोलन की सफलता ,जिस पर गर्व से 67वां सहकारिता सप्ताह मनाया जा रहा है ।सच्चाई सामने आएगी नही क्यों कि समारोह में सफलता की ढोल पीटने वाले वही है जो सहकारी आंदोलन का गला घोंटने के उत्तरदायी है ,और दिन प्रतिदिन इस उत्तरदायित्व का निर्वहन कर रहे है ।जमाकर्ता,सेवानिवृत्त कर्मचारी ,सहकारी बैंक सभी उपभोक्ता फोरम,उच्च न्यायालय,अन्य न्यायालयो में अपनी ही पूंजी के लिये चक्कर लगा रहे है ।अधिवक्ताओं के लिए स्वर्ग बन गया है ।निर्विवादित क्लेम के लिए रोते हुए लोग शोषण का शिकार हो रहे है । 

नरेंद्र सिंह एडवोकेट

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