अस्ताचलगामी आदित्य देव को अर्घ्य दे छठ का व्रत प्राची सूर्य की अर्घ्य के साथ सम्पन्न होगा


 जौनपुर,/बस्ती/गोरखपुर/संतकबीरनगर उत्तरप्रदेश
छठ की सभी तैयारियां पूरी होने के बाद गोमती नदी घाटों पर भी इस बार दूरी का ध्यान रखते हुए बैठने की व्यवस्था के बीच शुक्रवार को सभी व्रती  घाटों पर जाकर अस्ताचलगामी सूर्य को अध्र्य दिया और शनिवार को उगते सूर्य को अध्र्य के साथ यह व्रत संपन्न हो जाएगा। छठ व्रत के लिए नदी तटों तक जाने वाले मार्ग पर लाइट की सुविधा के साथ उसकी साफ-सफाई भी की गयी थी।
 सामाजिक संगठनों की ओर से व्रत करने वाली महिलाओं के स्नान के लिए नदी तट को सुविधायुक्त बनाया गया।  पंडितों के अनुसार वेद पुराणों में संध्या कालीन छठ पर्व को इसलिए प्रमुखता दी गई है ताकि संसार को यह पता लग सके कि जब तक हम अस्त होते सूर्य अर्थात बुजुर्गों को आदर सम्मान नहीं देंगे, तब तक उगता सूर्य अर्थात नई पीढ़ी उन्नत और खुशहाल नहीं होगी। 
कई तरह के सामाजिक सरोकार को अपने अंदर समेटे यह छठ शुद्धता का भी प्रतीक है। इसलिए छठ की पूजा में साफ-सफाई और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। साथ ही पूजा में बड़ा नींबू, केला, नारियल, गन्ना, बांस की टोकरी ठेकुए और नए चावल जरूरी है। इसके बिना पूजा अधूरा माना जाता है।  इस त्योहार को मनाने के पीछे ये मान्यता है कि छठ माता का जो व्रत रखता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह व्रत पति और बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाता है। छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना की जाती है।
 व्रत करने वाले मां गंगा और यमुना या किसी नदी या जलाशय के किनारे यह व्रत करते हैं। बहुत से लोग घर के छत पर भी यह पर्व करते हैं। इस व्रत से रोग मुक्ति का आशीर्वाद भी मिलता है।   छठ दीपावली के छठे दिन भगवान राम ने सीता संग अपने कुल देवता सूर्य की पूजा सरयू नदी में की थी। उन्होंने षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में अस्ताचलगामी सूर्य को फल, मिष्टान्न एवं अन्य वस्तुओं के साथ अर्घ्य प्रदान किया। सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। 
इसके बाद राज काज संभालना शुरू किया। इसके बाद से आम जन भी सूर्य षष्ठी का पर्व मनाने लगे। --महाभारत भी हुई थी छठ पूजा छठ पूजा की शुरुआत के बारे में यह भी कहा जाता है कि छठ पूजा महाभारत काल के समय से होती आ रही है। जब पांडव सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा। उन्होंने सूर्य देव और छठ मइया से पांडवों के राजपाट और सुख-समृद्धि की कामना की। जब पांडवों को उनका राज-पाट वापस मिला, तब द्रौपदी ने धूमधाम से छठ पूजा की थीं।   सूर्योपासना का अमोद्य अनुष्ठान है। इससे समस्त रोग, शोक, संकट और शत्रु नष्ट होते है और संतान का कल्याण होता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से इस व्रत का अनुष्ठान शुभारंभ होता है।
 कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सांध्यकाल में नदी, गंगा, नहर या तालाब के किनारे व्रती स्त्री पुरुष सूर्यास्त के समय अनेक प्रकार के पकवानों को बांस के सूप में सजाकर सूर्य नारायण को श्रद्धापूर्वक अर्घ्य अर्पित करते है। सप्तमी तिथि को प्रातः काल उगते हुए सूर्य को अर्घ्र्य देने के उपरांत ही व्रत पूर्ण होता है। सूर्यषष्ठी वाराणसी में डालाछठ के नाम से जानी जाती है। इस व्रत के अनुष्ठान करने से निःसंतान लोगों को पुत्र प्राप्त होता है। सूर्यदेव की अराधना से नेत्र, त्वचा व हृदय के सभी रोग ठीक हो जाते है।
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