संघ सस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे! संघ की स्थापना पर विशेष !

 


योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है ‘‘धर्म संस्थापनार्थाय समभवामि युगे-युगे’’ अर्थात-अधर्म और अत्याचार बढ़ने पर, वैचारिक अराजकता पर और देश में सामाजिक असहिष्णुता पर जब कुठाराघात होगा तो मैं किसी न किसी रूप में आऊँगा जरूर। परकीय दासता, भारतमाता को कारा से अवमुक्क्त करने,औऱ अपने उस उद्घोष को पूर्ण कराने,"संघे शक्ति:कलियुगे" के लिए आऊँगा,चूँकि ईश्वर सदा मनुष्य बन लोक क्रीड़ा करते हैं उसी परम्परा में 19 शादी में नागपुर में सामान्य परिवार का चिकित्सक समाजिक समस्या का चिकित्सक बन रोगी समाज को शारीरिक,मानसिक और वैचारिक निरोगी बनाने का मन्तव्य विजया दशमी को समाज के समक्ष रखा ।


कालिदास ने जब रघुवंश की रचना को सोचा तब असमंजस था ,इतने बड़े सूर्य से उत्तपन्नवंश ,रघुवंशयो के चरित्र का चित्रण कैसे कर सकूँगा,पर कहते है यदि साधन पवित्र है तो साध्य स्वत:,स्फूर्त हो जाता है,डॉक्टर साहब ने सिद्ध कर दिया कि संकल्प का कोई विकल्प नहीं।आज सघ वैश्विक अक्षयवट बन समाज के सभी क्षेत्रों के अपने स्वयंसेवको को भेज कर समाज निर्माण का अभिप्रेत पूर्ण कर रहा है।


कभी एक गीत हम गाते थे कि"दसों दिशाओं में जाएं ,दल बादल से छा जाएं",सो अब चरितार्थ हो रहा है।समाज के हर क्षेत्र में स्वयंसेवक आज विद्यमान हैं, सेवा,शिक्षा,सहकार, राजनीति,श्रम, बिज्ञान,विधि संस्कृति,धर्म,पुनर्जागरण आदि ही दसों दिसए हैं।डॉ जी ने बहुत करीब से देश की समस्त समस्याओं को जाना, पहचान तब सीमित समय दानियों की टीम खड़ा कर असीमित कार्य का स्वप्न देखा होगा।


बहुत विचार के बाद उन्होंने आज संघ की नींव का निर्णय लिया होगा।आज ही आद्याशक्ति ने महिषासुर का विनाश किया था,आज ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने समाज मे अहंकार के प्रतीक रावण का बध किया ,उसदिन विजया नाम की एकादशी तिथि थी इस लिए विजयादशमी नाम से ख्याति मिली।समाज मे व्याप्त अहंकार,और परकीयता से मुक्ति का दिन है विजया दशमी ओर संघ अमरबेलि की स्थापना का सुदिन भी!


 डाॅ0 केशव बलिराम हेडगेवार एक ऐसे क्रान्तिकारी थे, जिन्होनें कांग्रेस में रहकर कांग्रेस की रीति और नीति को सरकार विरोधी और देश विरोधी कहते हुए अपना महाराष्ट्र प्रान्त के कांग्रेस का उपाध्यक्ष का पद निरस्कृत कर दिया और फिर उर्द्धवाहुरीवामनः को चरितार्थ करते हुए 5 लोगों ने पंच परमेश्वर की परिकल्पना को साकार करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन का प्रवर्तन कर वैश्विक जगत को यह सन्देश देने का प्रयास किया कि भारत पहले हिन्दू राष्ट्र है उसके बाद कुछ और है।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक डॉ हेडगेवार ने संघ की स्थापना के समय कहा था “संघ का कार्य तथा उसकी विचारधारा हमारा कोई नया आविष्कार नहीं हैं,हमारा परम पवित्र सनातन हिन्दू धर्म, हमारी पुरातन संस्कृति, हमारा स्वयंसिद्ध हिन्दू राष्ट्र, तथा अनादि काल से चला आया परम पवित्र भगवा ध्वज, ये सभी बातें संघ ने पूर्ववत सबके सामने रखीं हैं। स्वयंसेवी संगठन की जरूरत एवं विचार संघ की स्थापना से पूर्व ही आ चुका था।


1923 में वर्धा में आधारित स्वयंसेवक परिषद में डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने एक उद्बोधन में कहा था कि “प्रत्येक स्थिती से जूझकर मरने वाले स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं की जरूरत है। आज के संदर्भ में एक संगठन के माध्यम से स्वतन्त्रता आंदोलन के लिए यह अत्यंत जरूरी है”। क्रांतिकारी नेता बापुजी पाठक के अनुसार “डॉ जी का रुख चुनावों की राजनीति से अलिप्त रहकर ऐसी संस्था बनाने का था, जिसमे नयी पीढ़ी को संस्कारित किया जा सके” नरेन्द्र सहगल ने अपनी पुस्तक भारत की सर्वांग स्वतंत्रता में बताया है


कि 1923 नागपुर में हिन्दू विरोधी आक्रामक मनोव्रत्ति के खिलाफ डॉ हेडगेवार के मार्गदर्शन में एतिहासिक डिंडी सत्याग्रह का आयोजन हुआ। नागपुर के प्रसिद्ध शुक्रवार तालाब के निकट “गणेश पेठ” हिंदुओं का एक पूजा स्थान था।


कट्टरपंथी नेताओं ने यहीं पर एक खुले स्थान में एक झोपड़ी बना दी। हिंदुओं के शांत रहने पर यहीं पर एक मस्जिद तामीर कर दी गयी। इन कट्टरपंथी मुस्लिमों ने जिलाधीश से यह आदेश भी जारी करवा दिया कि इस मस्जिद के पास से हिंदुओं की कोई भी धार्मिक यात्रा बाजे-गाजे के साथ नहीं निकल सकती। नतीजा यह हुआ कि 1923 में होने वाले गणेश विसर्जन का कार्यक्रम नहीं हो सका। हिंदुओं को इस इकतरफा एवं अधिनायकवादी सरकारी आदेश से गहरा धक्का लगा। इस आदेश ने हिन्दू नेताओं को


संगठित होकर “हिन्दू जागृति” करने का अवसर दिया। फलस्वरूप राजा लक्ष्मनराव भोंसले, डॉ मुंजे, परांजपे तथा डॉ हेडगेवार ने इस काले आदेश का विरोध करने के लिए सत्याग्रह करने का फैसला किया। हिंदुओं के


इस संगठित विरोध के परिणाम को भाँपकर कट्टरपंथी नेताओं ने प्रसिद्ध काकड़ आरती तथा भजन मंडली अर्थात “डिंडी यात्रा” को जाने देने की इजाजत दे दी”। प्रथम दिन 23


अक्टूबर को तो यात्रा विधिवत निकल गयी, परंतु बाद के दिनो में इन्ही नेताओं ने फिर यात्रा को रोक दिया। एक दिन तो उन लोगो ने बकायदा लाठी - दंड के द्वारा हिन्दू यात्रा पर आक्रमण करके यात्रा को समाप्त करने का प्रयास किया। डॉ हेडगेवार ने अपने साथी राष्ट्रवादी नेताओं के साथ घर घर जाकर हिंदुओं को भारी संख्या में यात्रा में शामिल होने के लिए तैयार किया।


हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक “रक्षा समिति” का गठन करके डाक्टर जी को उसका मंत्री बना दिया गया, इसमे 40 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए थे। हिंदुओं को इस प्रकार संगठित होता देखकर कट्टरपंथियों ने 19 नवंबर को निकाली जा रही गणेश यात्रा पर हमला कर दिया। इसे देखते हुए डॉक्टर हेडगेवार ने हिंदुओं को प्रतीकार के लिए तैयार करने हेतु मोहल्ला अनुसार बैठकों में हिंदुओं को लाठी भाले के साथ साथ यात्रा में शामिल होने का आवाहन किया। 21 नवंबर को यात्रा में लाठी लिए युवकों के साथ हिंदुओं की भारी उपस्थिती से कट्टरपंथी नेताओं के होश उड़ गए। परिणाम यह हुआ कि 25 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन काकड़ आरती तथा गणेश पेठ में गणेश विसर्जन पूर्ण शांति एवं उत्साह से सम्पन्न हुआ।


खिलाफत आन्दोलन और उससे उपजा संकट


संघ की स्थापना से पूर्व खिलाफत आन्दोलन के कारण हुए दंगो ने भारत के सभी प्रमुख नेताओं को झकझोर के रख दिया था। खिलाफत आंदोलन से पहले उसकी उपज को समझना बहुत जरूरी है। प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था, साम्राज्यों पर शासन की होड़ थी। जर्मनी के साथ-साथ तुर्की भी युद्ध हार चुका था और तभी खलीफा को समाप्त करने के लिए एक प्रस्ताव लाया गया। चूंकि उस समय खलीफा मुस्लिमों का सबसे बड़ा नेता और प्रतिनिधि होता था, इसलिए इस प्रस्ताव का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा। प्रस्ताव ने भारतीय मुस्लिमों की भावनाओं को भी आहत किया, और खिलाफत आंदोलन की नींव रखी गयी।


ब्रिटिश सरकार को जमकर कोसा गया, उसके खिलाफ लामबंदी की गई, उसी समय भारत भी अंग्रेजों से मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ रहा था। 23 नवंबर 1919 को, दिल्ली में दो भाइयों शौकत अली और मोहम्मद अली जौहर द्वारा अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमे मौलाना आजाद, अजमल खान और हसरत मोहनी ने भी शिरकत की। काँग्रेस सरकार ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन दिया।


 समर्थन ने कट्टरपंथियों के भीतर एक धार्मिक उत्साह को जन्म दिया। इसका पहला प्रकोप मोपला विद्रोह के रूप में सामने आया, मोपला केरल के मालाबार में स्थित एक जगह है। इसमे हजारों हिंदुओं को मारा गया और धर्मांतरित किया गया। मोपलो बाद मुलतान (सितंबर 1922), अमृतसर (अप्रैल 1923), आगरा सहारनपुर (अगस्त 1923 ) और नागपुर (1923 एवं 1924) में भीषण दंगे हुए जिसमे बड़ी तादाद में हिन्दू मारे गए। “सावरकर एकोस फ्रॉम फॉरगॉटन पास्ट” में विक्रम संपथ लिखते हैं कि काँग्रेस पार्टी ने आधिकारिक रूप से इसका खुल के कोई खंडन नहीं किया काँग्रेस की तरफ से प्रेस में एक वक्तव्य जारी किया गया जिसमे कहा गया“ कार्यसमिति को इस बात का पछतावा है कि मोपलाओं के बीच कुछ कट्टरपंथियों द्वारा तथाकथित धर्म परिवर्तन की बात सामने आ रही है, लेकिन काँग्रेस लोगों से ये अपील करती है कि सरकार और प्रेरित कथन पर भरोसा न करें”।


इन दंगों के सम्बन्ध में स्वामी श्रद्धानंद ने कहा था कि “एक एक प्रांत में दोनों जातियाँ एक दूसरे के प्रति संशयग्रस्त हो गयी हैं, यह मुझे स्वयं दिख रहा है। इसका कारण यही है कि हिन्दू समाज संगठित नहीं है। हिन्दू नेताओं को अपना समाज संगठित करना चाहिए”। हिन्दू महासभा के बेलगांव अधिवेशन में पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा था “हिंदुओं में भीरुता तथा दुर्बलता न होती तो हिन्दू मुसलमानों के बहुत से दंगे टल गए होते। इन दंगो से राष्ट्र के लिए विघातक परिस्थिति उत्पन्न हो जाने के कारण उनके लिए बहुत कुछ अंशों में जिम्मेदार हिंदुओं की दुर्बलता को दूर करना आवश्यक है”।


पांच वर्षों के भीतर हिन्दुओं के दो भीषण नरसंहारों ने डॉ हेडगेवार को सोचने पर मजबूर कर दिया था। 27 सितंबर 1925 को डाक्टर जी ने अपने विश्वस्त सहयोगियों को घर पर बुलाया और बैठक में थोड़े विचार के बाद ये घोषणा कर दी “ हम लोग आज से संघ प्रारम्भ कर रहे हैं”। डॉ हेडगेवार की मृत्यु के पश्चात उस समय के प्रमुख पत्र केसरी ने लिखा था “तिलक की मृत्यु के बाद बहुत से दल थे, परंतु किसी ने भी राष्ट्रीय जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलुओं राष्ट्र के लिए गर्व पैदा करने, देशभक्ति व आत्मसम्मान पर ध्यान केन्द्रित नहीं किया। राष्ट्र के आधार को जबूत करने के लिए यह जरूरी है। डॉ हेडगेवार ने इसे ही क्रियान्वित किया।


 


कट्टरपंथी नेताओं ने यहीं पर एक खुले स्थान में एक झोपड़ी बना दी। हिंदुओं के शांत रहने पर यहीं पर एक मस्जिद


तामीर कर दी गयी। इन कट्टरपंथी मुस्लिमों ने जिलाधीश से यह आदेश भी जारी करवा दिया कि इस मस्जिद के पास से हिंदुओं की कोई भी धार्मिक यात्रा बाजे-गाजे के साथ नहीं निकल सकती। नतीजा यह हुआ कि


1923 में होने वाले गणेश विसर्जन का कार्यक्रम नहीं हो सका। हिंदुओं को इस इकतरफा एवं अधिनायकवादी सरकारी व्यवस्था का शिकार होना पड़ा और संघ के अगुवाई में नागपुर में हजारों केI संख्या के विरोध प्रदर्शन के कारण सरकार को झुकना पड़ा।


आज संघ के जीवन दानी गैर भगवाधारी सन्त जिन्हें हम प्रचारक कहते है समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सघ के विचार को अंगद के पाव की तरह समाज से अन्धकार, वैचारिक अहंकार दूर कर अनथक प्रयास कर रहे है।


राजेन्द्र नाथ तिवारी


अध्यक्ष-,विद्वत परिषद


पूर्वांचल


 


 


 


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