सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भारत बने यह वैश्विक शांति के लिए आवश्यक-डॉ समन्वय नन्द

 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों  संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की 75वीं बैठक को संबोधित किया । इस दौरान उन्होंने  अनेक महत्वपूर्ण विषय उठाया । लेकिन उनके संबोधन में  सबसे अधिक महत्वपूर्ण विषय यह था कि भारत के समुचित  प्रतिनिधित्व के बिना संयुक्त राष्ट्र संघ की बहुत प्रासंगिकता नहीं है ।  प्रधानमंत्री  ने इस अवसर पर इस विषय को लेकर जो भी कहा वह वास्तव में भारत के 130 करोड भारतीयों के जनभावनाओं का ही प्रकटीकरण था ।


पूरे दुनिया में जितने लोग हैं उसमें से  प्रत्येक छह लोगों में से एक भारतीय है । लेकिन भारत की भूमिका संयुक्त राष्ट्र संघ में बहुत नहीं है । यानी दूसरे शब्दों में कहा जाए तो विश्व के एक छठाई लोगों के स्वर को राष्ट्र संघ में अनसुना किया जाता रहा है ।


संयुक्त राष्ट्र संघ की सबसे प्रभावशाली संस्था है राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ।  इसमें इसके पांच स्थायी सदस्य व दस अस्थायी सदस्य हैं ।  स्थायी सदस्यों में अमेरिका,रुस,   इंलैण्ड, फ्रांस, चीन हैं । देखा जाए तो सुरक्षा परिषद की समस्त अधिकार इन्हीं पांच देशों के पास है । ये देश अपने हिसाब से सुरक्षा परिषद को चलाते हैं । वे अपने निजी स्वार्थों को ध्यान में रख कर अपने इस वीटो  अधिकारों का प्रयोग करते रहते हैं । ऐसी घटनाओं को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद का इतिहास भरा पडा है जब इन देशों ने अपने अपने निजी स्वार्थ के लिए   अपने अधिकारों का प्रयोग किया है  ।


भारत जहां पूरे विश्व के हर छठा व्यक्ति निवास करता है उसका इसमें भूमिका नहीं है ।  भारत जिसे  सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रुप में स्थान मिलना चाहिए था अब भी उसे अपने अधिकारों से बंचित रखा गया है।  बार बार प्रयासों  तथा इतने सालों बाद भी भारत को इसका स्थायी सदस्य नहीं बनाया गया है ।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  अपने संबोधन  में इस विषय को काफी जोरदार तरीके से उठाया । उन्होंने कहा, 'भारत दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र है। विश्व की 18% से ज्यादा जनसंख्या, सैकड़ों भाषाओं-बोलियों, अनेकों पंथ, अनेकों विचारधारा वाली है। जो देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व सैकड़ों वर्षों तक करता रहा और सैकड़ों साल तक गुलाम रहा। जब हम मजबूत थे तो सताया नहीं, जब मजबूर थे तो बोझ नहीं बने।'


भारत कोई सामान्य देश नहीं है । हजारों सालों से निरंतर चली आ रही सभ्यता वाला देश है । लेकिन  गत कुछ सौ सालों तक  भारत गुलाम रहा । भारत पर सामरिक, आर्थिक व सांस्कृतिक हमले बार बार हुए । भारत सैकडों सालों तक विदेशी आक्रमणकारियों का शीकार रहा । सांस्कृतिक आक्रमण आज भी जारी है । वास्तव में देखा जाए तो भारत इस तरह के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो भारत की तरह गुलाम रहे , जिनके संस्कृति व सभ्यता पर आक्रमण हुए । ऐसे में भारत को संयुक्त राष्ट्र में समुचित प्रतिनिधित्व देने का मतलब यह है कि भारत जैसे सैकडों सालों तक गुलामी व हमले झेले मानवता को अधिकार देना है।  गोरे देशों के औपनिवेशिक नीतियों का शीकार हुए विभिन्न  देशों का भारत प्रतिनिधित्व करता है । लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत को अभी तक समुचित प्रतिनिधित्व व अधिकार नहीं दिये गये हैं ।


भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश होने के साथ साथ विविधता वाला देश भी है । भारत में इतनी विविधता है कि शायद कहीं और नहीं मिल सकता । भारत को संयुक्त राष्ट्र में समुचित प्रतिनिधित्व से वंचित करने का अर्थ है विविधता को सम्मान न देना है ।


संयुक्त राष्ट्र के स्थापना के उद्देश्य को देखा जाए तो दुनिया में युद्ध को रोकना व अन्य विषयों के साथ साथ मानवाधिकारों की रक्षा करना भी एक उद्देश्य रहा है । लेकिन  चीन जैसे देश जो पडोसी देशों पर कब्जा कर वहां मानवाधिकारो का उल्लंघन के लिए कुख्यात है वह  मानवाधिकार पर दूसरे देशों को सीख देता रहा है। तिब्बत जैसे देश में मानवता को तार तार करने वाले चीन को मानवाधिकारों पर दूसरे देशों को प्रवचन देने से ज्यादा हास्यास्पद स्थिति  और क्या हो सकती है ।


भारत को संयुक्त राष्ट्र मे भले ही समुचित प्रतिनिधित्व न मिला हो लेकिन भारत ने मानवता के प्रति अपने सभ्यतागत दायित्वों का निर्वहन करने में हमेशा आगे रहा है । विश्व के विभिन्न देशों मे जहां स्थितियां असामान्य हैं वहां संयुक्त राष्ट्र के शांतिरक्षक दल भेजता है । अन्य तथाकथित शक्तिशाली देश अपने अधिकारों का तो प्रयोग करते ही हैं लेकिन अपने  सैनिकों को इन अशांत क्षेत्रों में भेजने में पीछे रहते हैं । लेकिन इन अशांत क्षेत्रों में शांति स्थापित करने के लिए भारत सर्वाधिक सैनिक भेज कर अपने दायित्वों का निर्वहन करता आ रहा है ।


संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार संगठन  का पाखंड सबसे अधिक है । हाल ही में भारत  की संसद में पारित किये गये  नागरिकता संशोधन कानून पारित किया गया था। पाकिस्तान व अन्य देशों में सताये गये अल्पसंख्यक लोगों को भारत मे नागरिकता देने का प्रावधान इस कानून में था । संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार संगठन (युएन ह्यूमन राइट्स)   ने इसको लेकर आधिकारिक रुप से चिंता व्यक्त कर ट्वीट किया था । लेकिन यह वहीं मानवाधिकार संगठन है जो पाकिस्तान में हिन्दू व अन्य अल्पसंख्यक लडकियों को जबरन अपहरण व बलात धर्मांतरण कर अधेड उम्र के लोगों के साथ निकाह करवाने पर चुप्पी साध लेता है। उसे पाकिस्तान, बांग्लादेश व आफगानिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार व उनकी संख्या निरंतर घटने पर एक शब्द संयुक्त राष्ट् संघ का यह मानवाधिकार संगठन नहीं बोलता । यह मानवाधिकार संगठन अपने पाखंड को छुपाता भी नहीं है तथा मानवाधिकार के आड में अपने हिन्दू विरोधी रुख को स्पष्ट रुप से  प्रकट भी करता है ।


वास्तव में देखा जाए राष्ट्र संघ में ही मूल समस्या है । राष्ट्र संघ मे मतदान के दौरान लोग वोट नहीं देते । देश वोट देते हैं । इसका मतलब यह हुआ भारत के 130 करोड लोगों के पास एक वोट है तथा एक हजार जनसंख्या वाले वैटिकन के पास भी एक वोट है । दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वैटिकन के एक नागरिक की वोट की कीमत  भारत के नागरिक के वोट की कीमत से 130,0000,000 % प्रतिशत अधिक है । राष्ट्र संघ के 157 देशों में से अधिकांश ईसाई देश हैं जबकि 57 इसलामिक देश है । भारत के पास केवल एक वोट है ।  


प्रधानमंत्री मोदी ने इसलिए अपने भाषण में स्पष्ट रुप से इस बात की ओर संकेत किया है । उन्होंने स्पष्ट रुप से सवाल किया कि कब तक भारत के साथ भेदभाव कब तक होता रहेगा  ।


 विश्व का हर छठा व्यक्ति भारतीय होने के कारण भारत की अनदेखी अब संभव नहीं है । भारत अब अपनी शक्ति को स्वयं पहचान रहा है । यदि संयुक्त राष्ट्र संघ नहीं चेता तो भारत को ही इसका समाधान निकालना होगा । 


 


 


 


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