सहकारी बैंको को कटीले तार से बाध रहा यूपी कोआपरेटिव बैंक

कौटिल्य वार्ता
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बस्ती

आयुक्त एवं निबंधक  महोदय अब अधिनियम 1965 में प्रदत्त सारे अधिकारों का प्रयोग M D UPCB के अभिमत के बाद ही करेंगे ।(M D upcb को निबंधक सहकारिता द्वारा प्रषित पत्र दिनांक 01-06-2022)  ।प्रश्न उठा था कि SLIC में निबंधक सहकारिता को सदस्य भी नही बनाया गया है ,फिर भी SLIC की बैठकों की कार्यवृतिया आयुक्त एवं निबंघक से जारी कराकर शीर्ष बैंक अपने हित मे प्रयोग करता रहा ।

  प्रत्येक केंद्रीय जिला सहकारी बैंक का CEO वैसे ही MD UPCB के सामने अपने बैंक के हितों के संबंध में बात न कर अपने सेवा संबंधी हित पर ही ध्यान देता था ।अब तो upcb ने निबंघक से परिपत्र जारी कराकर प्रत्येक सहकारी बैंक के सीईओ को कटीले तारो से बांध भी दिया गया ।अब करता रहे प्रबंध संचालक Notwithstanding clause 29A के अंतर्गत प्रस्ताव ,कोई सचिव/सीईओ बिना M D से पूछे किसी भी प्रस्ताव का क्रियान्वयन नही करेगा ।अब तो सहकारिता के भगवान रजिस्ट्रार का लिखित फरमान मिल गया है।आंखे दिखाने और प्रशासनिक अधिकार का शायद ही किसी विधान में वित्तपोषण करने वाली संस्था को वित्तपोषित संस्था के ऊपर मिला हो ।

      अब जरा सोचिए कि आयुक्त एवं निबंधक महोदय किसी ज़िला सहकारी बैंक के CEO को यहाँ से वित्तपोषित होने वाली PACS एवम अन्य संस्थाओं के संबंध में यही आदेश निर्गत कर सकते है ।यह डिस्क्रिमिनेशन क्यों ?यहाँ तो ज़िला प्रशासनिक कमेटी का सदस्य-सचिव तक CEO बैंक को नही बनाया गया है ।जब कि PACS और सहकारी बैंक के गठन में यही व्यवस्था थी ।लेकिन समय समय सहकारिता मंत्रियो के दिमाग मे इन अधिकारियो द्वारा कुंडलिया जागृत की जाती रही और व्यवस्थाओं में परिवर्तन किया जाता रहा ।हा मैं इस संबंध 1993 से 1995 तक सहकारिता मंत्री रहे श्री आजम खां की सराहना करूंगा कि उनको कोई भी अधिकारी अपने अनुसार नही चला सका ।सहकारिता एक्ट में निर्वाचित प्रतिनिधियो को सबसे अधिक वैधानिक अधिकार इसी कार्यकाल में मिला ।आप 1994 मे तमाम जोड़ी गई या हटाई गई या परिवर्तित की गई धाराओं को देख सकते है ।

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