*' राम राजा सरकार के दो निवास हैं खास। * *दिवस ओरछा रहत हैं, शयन अयोध्या वास

कौटिल्य वार्ता
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 *“आज भी ओरछा के राजा हैं राम” *


 डॉ. राकेश मिश्र

(अध्यक्ष, पं. गणेश प्रसाद मिश्र सेवा न्यास)

(पूर्व प्रदेश अध्‍यक्ष, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद महाकौशल)


 


वैसे तो प्रभु राम हर भारतीय के रोम रोम में बसे हैं और विविध रूपों में उनका स्मरण के साथ उपासना की जाती है। अयोध्या उनका जन्मस्थान है तो बुन्देलखण्ड के ओरछा में भी भगवान राम के बाल और राजा रूप की बात है। आज भी ओरछा में भगवान राम राजा के रूप में स्थापित हैं। यह स्थान भगवान राम के भक्त वत्सल होने का भी बहुत बड़ा इतिहास अपने में संजोए हुए है। ओरछा को हम अयोध्या के राजा भगवान राम की नगरी के रूप में जानते हैं। जब रानी गणेश कुवंरी अयोध्या से राम राजा को लेकर ओरछा आईं तो भगवान राम के दिए गए तीन वचनों में से एक के अनुसार जिस एक जगह रानी कुंवरी द्वारा राम भगवान रखे गए, वहीं वे विराजमान हो गए और आज तक वहीं प्रतिष्ठित हैं। वही स्थान आज राम राजा मंदिर के नाम से विख्यात है। राम ने रानी से ओरछा चलने की सहमति जताई पर शर्त ये भी रखी कि वहां उनकी सत्ता ही काबिज़ होना चाहिए। राजा वे ही होंगे और राजशाही का अंत होगा।रानी ने इस पर सहमति दी और तभी से वहां राम को ही राजा माना जाता है। रियासत के आदेशों में भी राजा राम का ही जिक्र होता रहा और ऐसा कहा जता है कि मधुकर शाह बतौर सचिव अपने हस्ताक्षर करते रहे। रानी कुँवरि गणेश द्वारा भगवान राम को दिए गए वचन के अनुसार राजा मधुकरशाह ने अयोध्या में कनक भवन और नेपाल के जनकपुर यानी भगवान की ससुराल में नौलखा मंदिर का निर्माण कराया था। देश-विदेश के श्रद्धालुओं/पर्यटकों के अतिरिक्त स्थानीय, क्षेत्रीय लोग लाखों की संख्या में राम राजा के दर्शन करते हैं। विशेष रूप से तीज-त्यौहारों के अवसरों, रामनवमी, जन्मोत्सव आदि पर्वों पर काफी संख्या में लोग आते हैं और बेतवा नदी में स्नान कर राम राजा की पूजा-अर्चना करते हैं। ओरछा के मंदिर की चौखट पर लिखे शिलालेखों की मानें तो करीब साढ़े चार सौ वर्ष से ओरछा में राजा राम ही हैं। देश में रियासत भले ही समाप्त हो गईं हों पर ओरछा के राजा यानी भगवान राम को आज भी गार्ड ऑफ ऑनर दिए जाने की परंपरा है।



भक्ति की शक्ति ही थी कि भगवान राम को अपनी भक्त की बात मानकर ओरछा आना पड़ा और आज राम ओरछा के राजा हैं तो उन्हें ओरछा तक लाने वाली महारानी  कुंवरी गणेश को जनता माता कौशल्या और राजा मधुकरशाह को दशरथ का अवतार मानकर उनका स्मरण करती है। बताया जाता है मधुकरशाह जो कृष्ण भक्त थे वहीं उनकी पत्नी महारानी कुंवरी गणेश की राम में बेहद आस्था थी।बताया जाता है कि एक बार जब राजा ने रानी से कृष्ण उपासना के लिए वृंदावन चलने का आग्रह किया,  पर रानी राम की भक्ति में इतनी तल्लीन थीं कि उन्होंने राजा की बात को जैसे नज़रंदाज़ कर दिया। बातों बातों में बात इतनी बढ़ गई कि राजा मधुकरशाह ने रानी से बोला कि यदि आप राम की इतनी ही भक्त हो तो ले आओ राम। फिर क्या था रानी अपने आराध्य राम को लेने निकल पड़ीं अयोध्या -  सरयू नदी के तट पर अपनी कुटिया बनाकर अपने आराध्य भगवान की उपासना में लीन हो गईं। इधर राजा मधुकरशाह भी वृंदावन पहुंचे और कृष्ण उपासना में तल्लीन हो गए।


इस दौरान रानी कुंवरी गणेश का संपर्क सरयू के तट पर रह रहे महर्षि तुलसीदास जी से हुआ तो उन्होंने भी महारानी को आशीर्वाद प्रदान किया।उपासना और तपस्या से जब रानी को भगवान के दर्शन नहीं हुए तब महारानी ने निश्चय किया कि जब भगवान ही नहीं मिले तो वापस ओरछा जाने का प्रश्न नहीं है और उन्होंने सरयू नदी में ही छलांग लगा दी। रानी ने सरयू में छलांग तो लगाई पर वो एक दो बार जल में न प्रवेश कर अपने को किनारे पर खड़ा पाया। रानी भी राम की लीला समझ न पाई और जब तीसरी बार अपनी देह त्याग करने नदी में छलांग लगाई तो बालरूप में भगवान राम साक्षात प्रकट हुए और उन्होंने सशर्त रानी के आग्रह को स्वीकार किया। भगवान ने शर्त रखी कि वो पुख्‍य नक्षत्र में ही चलेंगे और जहां उन्हें एक बार विराजमान करा दिया जाएगा वहीं  पर रहेंगे।इधर रानी को उनके आराध्य मिलने की सूचना राजा मधुकरशाह को मिली वैसे ही उन्हें भी भगवान कृष्ण ने स्वप्न दिया कि राम और कृष्ण एक ही रूप हैं।बस फिर क्या राजा ने रानी को ससम्मान ओरछा लाने की व्यवस्था कराई। 


*' बैठे जिनकी गोद में, मोद मान विश्वेश।*

*कौशल्या सानी भईं, रानी कुअंर गनेश ' ।।*


भगवान राम के ओरछा आने की पौराणिक मान्यताओं में जो बात सामने आती है, उसमें एक मान्यता यह भी है कि जब भारत में विदेशी आक्रांताओं ने मंदिर नष्ट किए और धर्म ग्रंथ मिटाना शुरू किए तब अयोध्या के साधु संतों ने रामलला के विग्रह को सरयू नदी में जलसमाधि में छुपा दिया था, जिसे रानी कुंवरि गणेश तपस्या के बाद अयोध्या लाई थीं। सुरक्षा की दृष्टि से भगवान को रसोई में स्थापित किया गया था क्योंकि वह स्थान ज्यादा सुरक्षित माना जाता था। उस समय साधु महात्माओं को प्रखर हिंदूवादी राजा मधुकरशाह से ही उम्मीदें थीं जो पूरी हुई। अयोध्या के बाद देश में मध्यप्रदेश के ओरछा में ही एकलौता ऐसा मंदिर है जहां भगवान राम की राजा के रूप में पूजा होती है। बेतवा नदी के किनारे बसा ओरछा राम राजा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। नदी के दोनों किनारों के पुरातत्त्वीय सर्वेक्षण से पता चलता है कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल से लगातार पुष्पित एवं पल्ल्वित होता रहा है। 


*' मोरे तुम प्रभु गुरु पित माता। *

*जाऊँ कहाँ तज पद जन जाता।।*

*नीच टहल धरती सब करिहों।*

*पद पंकज विलोप भव तरिहों ' ।।*


ओरछा में राजा महल, लक्ष्मी मंदिर आदि में बनाये गए भित्ति चित्र बुन्देली कलम के नाम से जाने जाते हैं। इनमें अधिकतर रामायण, कृष्ण लीला और नायक-नायिकाओं आदि के चित्र हैं। इनको बनाने की विधि अत्यंत उन्नत किस्म की थी। प्रारम्भ में चूना सुरखी, बालू एवं जूट की प्रथम सतह बनाई जाती है। ओरछा की सांस्कृतिक धरोहर, महल एवं भवनों की स्थापत्य शैली एवं बुन्देली कलम की दृष्टि से इसे यूनेस्को (UNESCO) ने टेंटेटिव लिस्ट (Tentative List) में नामित किया है। उम्मीद है कि यह शीघ्र ही विश्व धरोहर स्मारक समूह में अंकित हो जायेगा। ऐसा होने पर यह बुन्देलखण्ड का दूसरा विश्व धरोहर स्मारक समूह बनेगा।


*' शरण गये प्रभु ताहि न त्यागा।*

*विश्व द्रोह तुम जन सम लागा ' ।।*


ओरछा का भारत के स्वतंत्रता संग्राम से भी गहरा रिश्‍ता है। अमर शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने भी अपने क्रांतिकारी जीवन के छह वर्ष यहीं  बिताए थे। यहीं रहकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम का तानाबना बुना था। ओरछा स्थित सातार में वह एक कुटिया में पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से रहते थे। सातार में उनकी कुटी क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बन गई थी। अधिकांश गुप्त योजनाएं इसी कुटी में बनतीं थीं। ओरछा के जंगलों में उन्होंने दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण और बच्चों को अध्यापन कराया। इसके साथ ही यहां उन्होंने अपने साथियों के साथ निशानेबाजी भी की। उनकी शहादत के बाद मां जगरानी देवी ने भी जीवन के अंतिम क्षण यहां बिताए।  


आगामी *6 से 15 अक्टूबर 2021 तक ओरछा में होने वाली भव्य रामलीला की तैयारियाँ जोरों पर हैं।आयोजन समिति के पदाधिकारी ओरछा में बेतवा नदी के कंचना घाट पर ऐतिहासिक महलों की पृष्ठभूमि में होने वाली भव्य वर्चुअल रामलीला को ऐतिहासिक बनाने में जुटे हुए हैं। इस राम लीला का आधुनिक सेटेलाइट चैनलों एवं संचार माध्‍यमों से सीधा प्रसारण हो सकेगा

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