वन्दे बोधमयं नित्यं,गुरुं शंकर रुपिणिम

 भगवान शिव के बारे में विस्तृत जानकारी

राजेश मंत्री


वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥3॥


भावार्थ:-ज्ञानमय, नित्य, शंकर रूपी गुरु की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥


भगवान् शिवजी जगत् के गुरू हैं, सर्व प्रथम शिवजी ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है, हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं, शिवजी ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया, भगवान् शिवजी दुनिया के सभी धर्मों का मूल हैं, शिवजी के दर्शन दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है।


हजारों वर्ष पूर्व वराह काल की शुरुआत में जब देवी-देवताओं ने धरती पर कदम रखे थे, तब उस काल में धरती हिमयुग की चपेट में थी, उस दौरान भगवान् शंकरजी ने धरती के केंद्र कैलाश को अपना निवास स्थान बनाया, भगवान् विष्णु ने समुद्र को और ब्रह्मा ने नदी के किनारे को अपना स्थान बनाया था।



पुराण कहते हैं कि जहां पर शिवजी विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है, जो भगवान् विष्णुजी का स्थान है, शिवजी के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था, इन तीनों देवताओं से सब कुछ हो गया।


वैज्ञानिकों का मानना है कि तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है, और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था, फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ और इस तरह धीरे-धीरे जीवन भी फैलता गया, सर्वप्रथम भगवान् शिवजी ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिये उन्हें आदि देव भी कहा जाता है। 


आदि का अर्थ प्रारंभ, शिव को आदिनाथ भी कहा जाता है, आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है, इस आदिश शब्द से ही आदेश शब्द बना है, नाथ साधु सम्प्रदाय के साधु जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश! भगवान् शिवजी के अलावा ब्रह्मा और विष्णु ने संपूर्ण धरती पर जीवन की उत्पत्ति और पालन का कार्य किया। 



सभी ने मिलकर धरती को रहने लायक बनाया और यहां देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष और मनुष्य की आबादी को बढ़ाया, ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल तक देवता धरती पर रहते थे, महाभारत के बाद सभी अपने-अपने धाम चले गयें, कलयुग के प्रारंभ होने के बाद देवता बस विग्रह रूप में ही रह गयें,  अत: उनके विग्रहों की पूजा की जाती है।


वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला, वेद जिन्हें रुद्र कहते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं, वराह काल के पूर्व के कालों में भी शिव थे। उन कालों की शिव की गाथा अलग है, देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी, ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। 


दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिवजी के समक्ष झुक गयें, इसीलिये शिवजी हैं देवों के देव महादेव, भगवान् शिवजी दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं, धर्म ग्रन्थों के अनुसार सतयुग में विशालकाय मानव हुआ करते थे, बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई। 



पुराणों के अनुसार पृथ्वी पर  दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करते थे, ब्रह्माजी ने मनुष्यों में शांति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी, विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी, ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। 


लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे, अंत में भगवान् शंकरजी ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई, भगवान शिवजी ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। 


ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो, यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था, इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था, इस धनुष का नाम पिनाक था, देवी-देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवरात को सौंप दिया गया था, उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान् शंकरजी बहुत क्रोधित हो गये थे।



और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी, एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया, बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया, देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को दे दिया, राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे, शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। 


इस धनुष को भगवान् शंकरजी ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था, उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था, लेकिन प्रभु  रामजी ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया, चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था, सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। 


उन सभी के अलग-अलग नाम थे, शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था, सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान् शंकरजी ने किया था, प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान् शंकरजी ने ही किया था।



निर्माण के बाद भगवान् शिवजी ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था, जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वतीजी को प्रदान कर दिया, पार्वतीजी ने इसे परशुरामजी को दे दिया,  और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुरामजी से मिला, इस तरह भगवान शिव के पास कई अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन उन्होंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र देवताओं को सौंप दियें।


उनके पास सिर्फ एक त्रिशूल ही होता था, यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था, त्रिशूल तिन प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है, इसमें तीन  तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम, वैज्ञानिक भाषा में इसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन कहते हैं,  इसके अलावा पाशुपतास्त्र भी शिवजी का अस्त्र है।


भगवान् शिवजी को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था, नाग कुल के सभी लोग शिवजी  के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे, कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था, नागकुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे, नागों के प्रारंभ में पाँच कुल हुआ करते थे- शेषनाग यानी अनंत, वासुकी, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक, ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव? 



हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है तो निश्चिरत ही ये मनुष्य नहीं होंगे, नाग वंशावलियों में शेषनाग को नागों का प्रथम राजा माना जाता है, शेषनाग को ही अनंत नाम से भी जाना जाता है, ये भगवान श्रीविष्णु के सेवक थे, इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुयें,  जो शिवजी के सेवक बने, फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला, वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था।


मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला यानी तक्षशिला नामक नगरी बसाकर अपने नाम से तक्षक कुल चलाया था, उक्त पांचों नाग वंश की गाथायें पुराणों में पाई जाती हैं, उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुयें, जिनके पृथ्वी के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।


शिवजी ने अपनी अर्धांगिनी पार्वतीजी को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखायें हो चली हैं, वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है, ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बतायें गये एक सौ बारह ध्यान सूत्रों का संकलन है, योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान् शिवजी के विज्ञान भैरव तंत्र और शिव संहिता में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुयीं है। 



तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है, भगवान् शिवजी के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं, इसी की एक शाखा हठयोग की है, भगवान् शिवजी कहते हैं- "वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:" अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिये भी अगम्य है, इस प्रकार शिवजी की भक्ति और पूजा से सांसारिक सभी व्याधियां समाप्त हो जाती है। 


शिवजी तो जगत के गुरु हैं, मान्यता के अनुसार सबसे पहले उन्होंने अपना ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया, सप्त ऋषियों ने शिवजी से ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और दुनिया के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया, इन सातों ऋषियों ने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं छोड़ा जिसको शिव कर्म, परंपरा आदि का ज्ञान नहीं सिखाया गया हो, आज सभी धर्मों में इसकी झलक देखने को मिल जायेगी। 


परशुरामजी और रावण भी शिवजी के शिष्य थे, शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत ‍की थी, जिसके चलते आज भी नाथ, शैव, शाक्त आदि सभी संतों में उसी परंपरा का निर्वाह होता आ रहा है, आदि गुरु शंकराचार्यजी और गुरु गोरखनाथजी ने इसी परंपरा और आगे बढ़ाया, भगवान् शिवजी ही पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ उन्हीं को है। 



उन्होंने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए सात ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के सात बुनियादी पहलू बन गयें,  वक्त के साथ इन सात रूपों से सैकड़ों शाखायें निकल आयीं, बाद में योग में आई जटिलता को देखकर पतंजलि ने तीन सौ ईसा पूर्व मात्र दो सौ सूत्रों में पूरे योग शास्त्र को समेट दिया, योग का आठवाँ अंग मोक्ष है, सात अंग तो उस मोक्ष तक पहुंचने के लिये है।


भगवान् शिवजी की सुरक्षा और उनके आदेश को मानने के लिये उनके गण सदैव तत्पर रहते हैं, उनके गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है, उसके बाद नन्दी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र, जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। 


भैरव भी दो हैं- काल भैरव और बटुक भैरव, दूसरी ओर वीरभद्र शिवजी का एक बहादुर गण था,  जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया, देव संहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिवजी ने अपनी जटा से वीरभद्र नामक गण उत्पन्न किया, भगवान् शिवजी के ये थे प्रमुख गण - भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। 



इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है, ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं, और प्रत्येक मनुष्य, आत्मा आदि की खैर-खबर रखते हैं, कैलाश पर्वत के क्षेत्र में उस काल में कोई भी देवी या देवता, दैत्य या दानव शिव के द्वारपाल की आज्ञा के बगैर अंदर नहीं जा सकता था।


ये द्वारपाल संपूर्ण दिशाओं में तैनात थे, इन द्वारपालों के नाम हैं- नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा और महाकाल, उल्लेखनीय है कि शिवजी के गण और द्वारपाल नंदी ने ही कामशास्त्र की रचना की थी, कामशास्त्र के आधार पर ही कामसूत्र लिखा गया था।


जैसे पंचायत का फैसला अंतिम माना जाता है, वैसे ही देवताओं और दैत्यों के झगड़े के बीच जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता था तो शिवजी की पंचायत का फैसला अंतिम होता था, शिवजी की पंचायत में पाँच देवता शामिल थे, ये पाँच देवता थे- सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र, और भगवान् विष्णुजी ये शिव पंचायत के हिस्से कहलाते थें।



जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं ‍उसी तरह बाण, चंड, नंदी, भृंगी आदि ‍शिव के पार्षद हैं, यहां देखा गया है कि नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी हैं और पार्षद भी, भगवान् शिवजी को वनवासी से लेकर सभी साधारण व्यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्थर के ढेले और बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। 


इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिवजी का चिह्न माना गया है, कुछ लोग डमरू और अर्ध चंद्र को भी शिवजी का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिवजी की ज्योति का पूजन करते हैं, भगवान् शिवजी की जटायें हैं, उन जटाओं में एक चंद्र चिह्न होता है, उनके मस्तिष्क पर तीसरी आंख भी है, वे गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। 


उनके एक हाथ में डमरू तो दूसरे में त्रिशूल है, वे संपूर्ण देह पर भस्म लगाये रहते हैं, शरीर के निचले हिस्से को वे व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं, वे वृषभ की सवारी करते हैं और कैलाश पर्वत पर ध्यान लगायें बैठे रहते हैं, माना जाता है कि केदारनाथ और अमरनाथ में वे विश्राम करते हैं।

राजेश मंत्री


शिवजी और भस्मासुर का दृष्टांत आपको श्रीमद्भागवत कथा में बता चुका हूंँ, जो आप सभी पढ़ चुके होगें, उस समय भगवान् शंकरजी वहां से भाग गयें, उनके पीछे भस्मासुर भी भागने लगा, भागते-भागते शिवजी उस पहाड़ी के पास रुके, और उन्होंने इस पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गयें।


भगवान् विष्णुजी ने आकर उनकी जान बचाई। माना जाता है कि वह गुफा जम्मू से कुछ दूरी पर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है, इन खूबसूरत पहाड़ियों को देखने से ही मन शांत हो जाता है, इस गुफा में आज भी हर दिन सैकड़ों की तादाद में शिवभक्त शिवजी की अराधना करने आते हैं, और वहाँ रह कर तपस्या करते हैं।

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